भोपाल। मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस अब सरकार के रडार पर है। उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने मेडिकल कॉलेजों के चिकित्सकों को संस्थान में पूरा समय देने के निर्देश दिए हैं। सरकार ने संकेत दिया है कि ड्यूटी में लापरवाही या निजी प्रैक्टिस के कारण सरकारी सेवा प्रभावित हुई तो कार्रवाई निलंबन से लेकर सेवा समाप्ति तक पहुंच सकती है।
सरकार की नजर सिर्फ डॉक्टर के अस्पताल में पहुंचने पर नहीं, बल्कि पूरे कार्यदिवस में उसकी भूमिका पर है। डॉक्टरों को ओपीडी के साथ ऑपरेशन थिएटर, मरीजों के नियमित राउंड और पीजी छात्रों की पढ़ाई-प्रशिक्षण में भी सक्रिय रहना होगा। उपमुख्यमंत्री ने डिजिटल उपस्थिति और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश भी दिए हैं।
सरकार का तर्क साफ है—मेडिकल कॉलेज केवल नौकरी की जगह नहीं, बल्कि इलाज, चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण के बड़े केंद्र हैं। डॉक्टर यदि सरकारी ड्यूटी के समय निजी मरीजों में व्यस्त रहते हैं तो उसका सीधा असर उस मरीज पर पड़ता है जो सरकारी अस्पताल को अपना सहारा मानकर आता है।
हालांकि डॉक्टरों की तरफ से भी सुविधाओं और कार्य-परिस्थितियों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसलिए सरकार की इस सख्ती की असली परीक्षा केवल कार्रवाई में नहीं, व्यवस्था सुधार में भी होगी।
निजी प्रैक्टिस पर रोक और जवाबदेही जरूरी है, लेकिन साथ में पर्याप्त स्टाफ, उपकरण, दवाएं और बेहतर कार्य वातावरण भी सरकार को देना होगा। मरीज को आखिरकार एक ही चीज चाहिए—सरकारी वेतन लेने वाला डॉक्टर सरकारी ड्यूटी के समय सरकारी अस्पताल में मौजूद मिले।
अब देखना यह है कि यह चेतावनी फाइलों में दर्ज आदेश बनकर रह जाती है या मेडिकल कॉलेजों में पहली बार ‘ड्यूटी पूरी, जवाबदेही पूरी’ वास्तव में दिखाई देती है।

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