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दादा की जिद जीती, महापौर झुके; जीतू यादव फिर एमआईसी में—इंदौर भाजपा में किसका चला सिक्का?

 


इंदौर। नगर निगम की राजनीति में एक बार फिर साफ हो गया कि एमआईसी की कुर्सी सिर्फ विभाग संभालने का पद नहीं, बल्कि शहर भाजपा के भीतर सियासी प्रभाव और शक्ति-संतुलन का पैमाना भी है। करीब 18 महीने तक भाजपा से बाहर रहे पार्षद जीतू यादव की न केवल पार्टी में वापसी हुई, बल्कि अब उनकी महापौर परिषद में भी वापसी हो गई है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अमेरिका रवाना होने से पहले आदेश जारी कर यादव को एमआईसी में शामिल किया और उन्हें विद्युत एवं यांत्रिकी विभाग की जिम्मेदारी सौंपी।



यह वापसी इसलिए अहम है क्योंकि अगस्त में भाजपा ने यादव का छह साल का निष्कासन समाप्त कर दिया था। पार्टी के मुताबिक पुलिस जांच में उन्हें राहत मिलने के बाद संगठनात्मक कार्रवाई वापस ली गई। जनवरी 2025 में भाजपा ने उन्हें कमलेश कालरा के घर हुए हमले और विवाद के बाद छह साल के लिए निष्कासित किया था। यादव ने उस समय एमआईसी पद भी गंवाया था।


लेकिन पार्टी में वापसी के बाद एमआईसी की कुर्सी इतनी आसानी से नहीं मिली। अगस्त में खबरें सामने आई थीं कि महापौर पुष्यमित्र भार्गव और भाजपा नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा यादव की एमआईसी वापसी को लेकर अनिच्छुक थे। यादव का पुराना विभाग अस्थायी तौर पर निरंजन सिंह चौहान ‘गुड्डू’ को सौंपे जाने की चर्चा भी हुई।


फिर तस्वीर बदली और कुछ ही सप्ताह में वही विभाग यादव के पास लौट आया। राजनीतिक गलियारों में इसे विधायक रमेश मेंदोला के प्रभाव से जोड़कर देखा जा रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों में यादव को लंबे समय से मेंदोला खेमे के करीबी के रूप में बताया गया है और 2022 में भी एमआईसी में उनकी एंट्री मेंदोला की पसंद के रूप में दर्ज हुई थी।


कालरा का विरोध, विवाद फिर जिंदा


यादव की वापसी के साथ पुराना विवाद भी फिर सतह पर आ गया है। पार्षद कमलेश कालरा ने राजबाड़ा पर परिवार के साथ मौन धरना देकर एमआईसी में यादव की नियुक्ति का विरोध किया। यह वही विवाद है जिसके बाद जनवरी 2025 में भाजपा ने यादव के खिलाफ कड़ी संगठनात्मक कार्रवाई की थी।


हालांकि मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि बाद की पुलिस जांच में यादव के खिलाफ घटना में स्पष्ट संलिप्तता के साक्ष्य नहीं मिलने की बात सामने आई और इसी आधार पर भाजपा ने उनका निष्कासन समाप्त किया। इसलिए अब राजनीतिक सवाल यह है कि संगठन ने जब यादव को दोषमुक्त मानकर वापसी कराई, तो एमआईसी में वापसी रोकने की राजनीतिक कोशिश आखिर किस आधार पर थी?


मेंदोला बनाम महापौर की कहानी?


इंदौर भाजपा की अंदरूनी राजनीति को समझने वाले इसे केवल एक पार्षद की नियुक्ति नहीं मान रहे। मामला विधानसभा क्षेत्र-2 के प्रभावशाली विधायक रमेश मेंदोला, महापौर पुष्यमित्र भार्गव और संगठन के बीच शक्ति-संतुलन से जोड़कर देखा जा रहा है।


एक तरफ महापौर की प्रशासनिक टीम और स्थानीय संगठन के भीतर यादव की वापसी को लेकर शुरुआती हिचक दिखाई दी। दूसरी तरफ पार्टी नेतृत्व ने अंततः उनकी एमआईसी वापसी का रास्ता साफ कर दिया। 11 सितंबर को नियुक्ति आदेश जारी होने के बाद तस्वीर स्पष्ट हो गई—विरोध के बावजूद जीतू लौटे और वही अहम विभाग लेकर लौटे।


अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि जीतू यादव एमआईसी में क्यों लौटे। असली सवाल यह है कि इंदौर भाजपा में फैसला आखिर कौन कर रहा है—महापौर, नगर संगठन या विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक प्रभाव?


और दूसरा सवाल इससे भी बड़ा है—अगर पार्टी ने पुलिस जांच के आधार पर यादव का निष्कासन खत्म किया है, तो क्या अब कालरा प्रकरण पर संगठन की पूरी राजनीतिक कहानी भी खत्म मानी जाए?


फिलहाल तस्वीर यही कह रही है: कुर्सी खाली रही, विभाग दूसरे को मिला, विरोध हुआ, लेकिन अंततः जीतू यादव लौट आए। इंदौर की सत्ता की इस पटकथा में फिलहाल ‘दादा’ की चाल भारी दिखाई दे रही है।

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