मोहन सरकार फिर RBI के दरवाजे पर; 18 और 30 साल में चुकाए जाएंगे ₹1,500 करोड़
भोपाल | विशेष रिपोर्ट | प्रणव बजाज
मध्यप्रदेश में विकास की रफ्तार के साथ सरकारी उधारी की रफ्तार भी लगातार बनी हुई है। सितंबर में सरकार तीसरी बार बाजार से कर्ज लेने जा रही है। इस बार ₹1,500 करोड़ की उधारी प्रस्तावित है, जिसे दो हिस्सों—₹800 करोड़ और ₹700 करोड़—में लिया जाएगा। पहला ऋण 18 साल और दूसरा 30 साल में चुकाया जाना है। इससे पहले सितंबर में सरकार ₹3,600 करोड़ और फिर ₹2,500 करोड़ की बाजार उधारी कर चुकी है। ₹2,500 करोड़ की उधारी के बाद राज्य की कुल बकाया देनदारी ₹5,42,614 करोड़ बताई गई थी।
यानी सितंबर का हिसाब देखें तो सवाल सिर्फ डेढ़ हजार करोड़ का नहीं है—एक ही महीने में बार-बार बाजार की ओर देखती सरकार और बढ़ती देनदारी का है। सरकारी दस्तावेजों में ऐसी बाजार उधारी का उद्देश्य विकास और उत्पादक योजनाओं के लिए वित्त जुटाना बताया गया है।
सरकार के 2026-27 बजट में कुल ₹1,06,190 करोड़ की उधारी का अनुमान रखा गया है, जबकि इसी साल ₹34,437 करोड़ कर्ज चुकाने का प्रावधान है। राजकोषीय घाटा ₹71,458 करोड़ यानी GSDP का 3.9% अनुमानित है।
व्यंग्य यहीं है—विकास की फाइल आगे बढ़ती है, तो कर्ज की फाइल भी साथ-साथ मोटी होती जाती है। सवाल यह नहीं कि सड़क, सिंचाई या दूसरी परियोजनाओं के लिए पैसा क्यों लिया जा रहा है; सवाल यह है कि बढ़ती उधारी के साथ सरकार की भविष्य की देनदारियों का हिसाब जनता के सामने कितना साफ है?
विपक्ष सरकार पर वित्तीय प्रबंधन को लेकर सवाल उठा रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता अविनीश बुंदेला ने आरोप लगाया है कि सरकार लगातार कर्ज लेकर खर्च कर रही है और जनता को यह बताया जाना चाहिए कि पिछले वर्षों में लिया गया कर्ज किन मदों में खर्च हुआ। यह विपक्ष का राजनीतिक आरोप है।
दूसरी ओर, सरकार ने हाल में विकास, शिक्षा, सिंचाई और अधोसंरचना से जुड़े ₹42,490 करोड़ से अधिक के प्रस्तावों को मंजूरी दी है।
अब असली सवाल यही है—आज की विकास योजनाओं की कीमत क्या आने वाली पीढ़ियां 18 साल और 30 साल तक चुकाती रहेंगी?

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