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आतंकवाद पर पाकिस्तान का पाखंड: दिन में शांति का भाषण, रात में आतंक का कारोबार!



संपादकीय | प्रणव बजाज

संयुक्त राष्ट्र की विशाल इमारत में पाकिस्तान ने फिर कश्मीर का पुराना कैसेट चलाया, लेकिन भारत ने इस बार जवाब ऐसा दिया कि सवाल कश्मीर से घूमकर सीधे आतंकवाद के उस ढांचे तक पहुंच गया, जिसे लेकर इस्लामाबाद वर्षों से सफाई देता आया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के आरोपों के जवाब में भारत ने सीमा पार आतंकवाद, कट्टरता और आतंकवादी ढांचे को लेकर पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा किया।


भारत की प्रथम सचिव पेटल गहलोत ने संयुक्त राष्ट्र में राइट टू रिप्लाई के दौरान पाकिस्तान पर तीखी टिप्पणी की। भारत ने ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में पाए जाने का संदर्भ देते हुए आतंकवाद के खिलाफ उसके दावों पर सवाल उठाया। संदेश सीधा था—आतंकवाद को पालकर शांति का उपदेश देने की राजनीति अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर आसानी से नहीं बिकेगी।


विडंबना देखिए। पाकिस्तान को कश्मीर दिखाई देता है, लेकिन आतंकवाद का वह आईना दिखाई नहीं देता जिसमें उसकी अपनी नीतियों पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं। भारत ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और आतंकवाद के बुनियादी ढांचे का उल्लेख करते हुए कहा कि उसे अपनी ऊर्जा दुष्प्रचार के बजाय इन समस्याओं पर लगानी चाहिए।


भारत ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति और ईशनिंदा कानूनों को लेकर भी सवाल उठाए। पाकिस्तान इन आरोपों से असहमत हो सकता है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच पर उठे इन सवालों का जवाब केवल कश्मीर का नाम लेकर नहीं दिया जा सकता।


सबसे बड़ा संदेश यही है—आतंकवाद और सद्भावना साथ-साथ नहीं चल सकते। यदि किसी देश की जमीन से आतंकवाद संचालित होने के आरोप लगातार उठते हैं, तो केवल कूटनीतिक बयान उस सवाल को खत्म नहीं कर सकते।


भारत की ‘शून्य-सहिष्णुता’ नीति का अर्थ भी यही होना चाहिए कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई केवल भाषणों तक सीमित न रहे। सीमा पार से आने वाली हर चुनौती का जवाब तथ्य, कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की ठोस कार्रवाई से दिया जाए।


पाकिस्तान चाहे जितनी बार कश्मीर का राग छेड़े, असली सवाल अब भी वही है—आतंकवाद की फैक्ट्री बंद होगी या संयुक्त राष्ट्र के मंच पर उसका विज्ञापन चलता रहेगा?


दुनिया को भाषण नहीं, जवाब चाहिए। और आतंकवाद के मामले में जवाबदेही से बड़ा कोई कूटनीतिक शब्द नहीं।

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