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IAS की पत्नी लिफ्ट में फंसी तो सरकार दौड़ी, दिव्यऋषि की मौत पर कमेटी बैठी... 1,102 मौतों पर सिस्टम को करंट कब लगेगा?

व्यंग्य | प्रणव बजाज 

मध्यप्रदेश में सरकारी सिस्टम भी कमाल का है। उसे जगाने के लिए सिर्फ हादसा काफी नहीं होता, हादसे की हैसियत भी शायद देखनी पड़ती है!



20 सितंबर को भोपाल के एक होटल की लिफ्ट में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की पत्नी समेत तीन लोग फंस गए। करीब 20-25 मिनट बाद रेस्क्यू हुआ। जांच हुई तो लिफ्ट में एआरडी नहीं मिला, मेंटेनेंस में कमी सामने आई और तीन लिफ्ट सील कर दी गईं।


फिर 27 सितंबर को डीबी मॉल के सामने बिजली के खंभे में करंट की चपेट में आकर भाजयुमो नेता और अधिवक्ता दिव्यऋषि तिवारी की मौत हो गई। मामला गंभीर था, मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद चार अधिकारियों की जांच समिति बनी और पांच दिन में रिपोर्ट मांगी गई। पुलिस ने भी अज्ञात के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया है।


सरकार की तेजी देखकर अच्छा लगता है। मगर असली सवाल यहीं से शुरू होता है।


MPERC की 2024-25 रिपोर्ट में बिजली हादसों से हुई 1,102 मौतों का आंकड़ा सामने आता है।


यानी सवाल यह नहीं कि दिव्यऋषि की मौत पर जांच क्यों हुई। जांच बिल्कुल होनी चाहिए। सवाल यह है कि बाकी मौतों के बाद वही सरकारी रफ्तार कहां चली जाती है?


लिफ्ट ने कुछ लोगों को बीस मिनट रोका तो सिस्टम दौड़ पड़ा। खंभे ने एक जान ले ली तो कमेटी बैठ गई। लेकिन हजार से ज्यादा मौतों का आंकड़ा सामने हो तो क्या सिस्टम की फाइल भी बिजली गुल होने से बंद हो जाती है?


व्यंग्य यही है—सरकार को करंट का पता तब चलता है, जब झटका खबर बन जाए।


आम आदमी के लिए सवाल अभी भी वही है—उसकी जान हादसे का आंकड़ा है या सरकार की जिम्मेदारी?

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