Top News

कांग्रेस, सपा, भाजपा या चंद्रशेखर… BSP की कमजोर पकड़ से किसे मिलेगा दलित वोट? 2027 में 21% वोट बैंक बनेगा निर्णायक

 


लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन दलित वोट को लेकर सियासी दौड़ तेज हो चुकी है। कभी यूपी की सत्ता की निर्णायक ताकत रही बहुजन समाज पार्टी आज अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रही है। 2014 लोकसभा चुनाव में BSP को 19.77% वोट मिले थे, 2019 में भी उसका वोट शेयर 19.42% रहा, लेकिन 2024 में यह घटकर सिर्फ 9.39% रह गया और पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी।



यही गिरावट 2027 के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गई है—BSP के खिसकते वोट आखिर जाएंगे किसके खाते में?


2024 में सपा ने यूपी की 80 लोकसभा सीटों में 37 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। दोनों दलों के गठबंधन ने 43 सीटें हासिल कीं। इस प्रदर्शन के बाद सपा अब दलित वोटरों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने में जुटी है। पार्टी ने दलित बहुल इलाकों में ‘संविधान बचाओ PDA जन पंचायत’ जैसे अभियान की तैयारी की है।


भाजपा भी पीछे नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 2027 से पहले उन 115 विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष फोकस कर रहे हैं, जहां 2024 लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने बढ़त बनाई थी। इन क्षेत्रों में 38 हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं का शिलान्यास-लोकार्पण किया जा चुका है।


दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी दलित राजनीति में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। 2024 में उनकी पार्टी ने नगीना लोकसभा सीट जीती थी—यह संकेत है कि BSP का खाली होता राजनीतिक स्पेस पूरी तरह किसी एक दल को नहीं मिलने वाला।


अब असली लड़ाई सिर्फ दलित वोट हासिल करने की नहीं, बल्कि BSP के पुराने सामाजिक आधार को किस दल के साथ जोड़ा जा सकता है, इसकी है।


2027 में अगर BSP का वोट और बिखरता है तो फायदा सपा-कांग्रेस गठबंधन, भाजपा और चंद्रशेखर—तीनों को अलग-अलग इलाकों में मिल सकता है। लेकिन अगर मायावती अपना पुराना वोट बैंक रोकने में सफल रहीं, तो यूपी का पूरा चुनावी गणित फिर बदल सकता है।


सवाल एक ही है—दलित वोट का अगला ठिकाना कौन? जवाब 2027 का चुनाव देगा।

Post a Comment

Previous Post Next Post