बीजिंग। दुनिया की अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ रही है और इसी बीच चीन ने सोने की खोज और अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की रफ्तार तेज कर दी है। लियाओनिंग में मिले Dadonggou गोल्ड डिपॉजिट में 1,444.49 टन प्रमाणित सोने के भंडार का अनुमान सामने आया है। इसे चीन में सात दशकों से अधिक समय में सबसे बड़ी एकल सोने की खोजों में गिना जा रहा है।
लेकिन कहानी सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है। चीन समुद्री क्षेत्रों में भी खनिज और सोने की संभावनाएं तलाश रहा है। ऐसे में सवाल उठता है—आखिर चीन सोने के पीछे इतना बड़ा दांव क्यों लगा रहा है?
सबसे बड़ा कारण है आर्थिक सुरक्षा। चीन पिछले कई महीनों से अपने आधिकारिक गोल्ड रिजर्व में लगातार इजाफा कर रहा है। 2026 के पहले छह महीनों में पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने 40 टन से ज्यादा सोना जोड़ा, जबकि जुलाई में भी करीब 20 टन की खरीद दर्ज हुई। इससे चीन का आधिकारिक गोल्ड स्टॉक लगभग 2,366 टन तक पहुंच गया।
सोना चीन के लिए सिर्फ कीमती धातु नहीं, बल्कि डॉलर और दूसरे विदेशी वित्तीय परिसंपत्तियों पर निर्भरता घटाने का सुरक्षा कवच भी है। भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार युद्ध और प्रतिबंधों के जोखिम के बीच केंद्रीय बैंक सोने को अपेक्षाकृत सुरक्षित रिजर्व मानते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक चीन की लगातार खरीद इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
एक और वजह घरेलू मांग है। 2024 में चीन ने करीब 377 टन सोने का उत्पादन किया, जबकि घरेलू खपत करीब 985 टन रही। यानी देश को अपनी मांग पूरी करने के लिए बड़े पैमाने पर बाहरी स्रोतों पर भी निर्भर रहना पड़ता है।
इसलिए 3,174 टन की संख्या को केवल “एक साल में निकाला गया सोना” समझना भ्रामक होगा। असली कहानी यह है कि चीन जमीन के नीचे नए भंडार खोज रहा है, समुद्र में संभावनाएं तलाश रहा है और ऊपर से केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहा है।
सवाल अब यह है—क्या चीन आने वाले वर्षों में सोने को अपनी आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत का और बड़ा हथियार बनाने जा रहा है?

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