अमेरिकी डॉलर के वैश्विक दबदबे को चुनौती देने की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। भारत की मेजबानी में 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन से पहले स्थानीय मुद्राओं में कारोबार और डॉलर पर निर्भरता घटाने का मुद्दा प्रमुख आर्थिक एजेंडे में शामिल है।
लेकिन इसे सीधे ‘डॉलर खत्म करने की योजना’ कहना अभी जल्दबाजी होगी। BRICS देशों की रणनीति फिलहाल साझा मुद्रा बनाने से ज्यादा स्थानीय मुद्राओं में आपसी व्यापार, सीमा-पार भुगतान की वैकल्पिक व्यवस्था और डिजिटल भुगतान ढांचे को मजबूत करने की दिखाई दे रही है। भारत के केंद्रीय बैंक ने BRICS देशों की डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने का प्रस्ताव भी दिया है, जिससे कुछ अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में डॉलर की जरूरत कम हो सकती है।
भारत, चीन और रूस की प्राथमिकताएं भी पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं। चीन अपने मुद्रा प्रभाव को बढ़ाना चाहता है, रूस प्रतिबंधों और पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता घटाने में रुचि रखता है, जबकि भारत रणनीतिक स्वायत्तता के साथ डॉलर समेत किसी एक मुद्रा पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। दिलचस्प बात यह है कि रूस ने हाल ही में साफ कहा है कि वह किसी औपचारिक ‘डॉलर-विमुक्ति’ अभियान का लक्ष्य नहीं रखता, बल्कि भुगतान के विकल्प बढ़ाने का समर्थन करता है।
तो क्या डॉलर की बादशाहत खत्म हो जाएगी? फिलहाल इसका जवाब ‘नहीं’ है। डॉलर के मुकाबले किसी विकल्प को वैश्विक स्तर पर खड़ा करने के लिए विशाल वित्तीय बाजार, भरोसेमंद भुगतान तंत्र और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का विश्वास चाहिए। चीन की मुद्रा के सामने भी अभी पूंजी की स्वतंत्र आवाजाही और वैश्विक निवेश बाजार की गहराई जैसी चुनौतियां हैं।
इसलिए BRICS का असली खेल शायद डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि दुनिया को उसके विकल्प देना है। अगर स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल लगातार बढ़ा, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था जरूर ज्यादा बहुध्रुवीय हो सकती है।

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