नई दिल्ली। चुनावी राजनीति में महिला मतदाताओं के बाद अब युवाओं पर राजनीतिक दलों की नजर टिक गई है। भाजपा भी युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए आर्थिक सहायता, रोजगार, कौशल विकास और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी योजनाओं पर फोकस बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। राजनीतिक हलकों में इसे आने वाले चुनावों के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
युवा मतदाता किसी भी चुनाव में बड़ा प्रभाव रखते हैं। बेरोजगारी, सरकारी भर्तियों में देरी, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का खर्च और निजी क्षेत्र में सीमित अवसर युवाओं की प्रमुख चिंताएं हैं। ऐसे में आर्थिक सहायता या अन्य राहत योजनाओं के जरिए सरकार सीधे इस वर्ग तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकती है।
भाजपा की रणनीति केवल खाते में पैसा पहुंचाने तक सीमित रहने के बजाय कौशल प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर, शिक्षा ऋण और स्वरोजगार को बढ़ावा देने वाली योजनाओं के साथ आगे बढ़ सकती है। इससे सरकार के सामने एक साथ राजनीतिक और आर्थिक दोनों लक्ष्य साधने का अवसर होगा।
हालांकि विपक्ष के लिए भी यह बड़ा मुद्दा होगा। वह सरकार से सवाल कर सकता है कि युवाओं को आर्थिक सहायता देने के बजाय स्थायी रोजगार क्यों नहीं दिया जा रहा। युवाओं के बीच यह बहस भी महत्वपूर्ण होगी कि उन्हें कुछ समय की आर्थिक मदद चाहिए या बेहतर नौकरी और भविष्य के स्थायी अवसर।
महिलाओं के बाद युवाओं को केंद्र में लाने की रणनीति बताती है कि चुनावी राजनीति में लाभार्थी वर्गों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। अब असली मुकाबला इस बात पर होगा कि कौन युवा को सिर्फ सहायता देता है और कौन उसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्थायी अवसर पैदा करता है।

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