संपादकीय | प्रणव बजाज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से भारतीय उद्योग जगत के सामने एक बड़ा सवाल रखा—क्या अगले दशक में वैश्विक फॉर्च्यून 500 में भारत की 50 कंपनियां नहीं हो सकतीं? सवाल महत्वाकांक्षी है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत की मौजूदा आर्थिक व्यवस्था इस महत्वाकांक्षा का बोझ उठाने के लिए तैयार है?
आज वैश्विक फॉर्च्यून 500 में भारत की केवल नौ कंपनियां हैं। 50 तक पहुंचने के लिए 41 नई कंपनियां चाहिए। यानी मौजूदा संख्या के मुकाबले पांच गुना से भी अधिक विस्तार। दूसरी तरफ अमेरिका की 141 और ग्रेटर चीन की 122 कंपनियां इस सूची में हैं। यह अंतर केवल कंपनियों की संख्या का नहीं है। यह पूंजी, तकनीक, उत्पादन क्षमता, बाजार, शोध, वैश्विक पहुंच और नीतिगत निरंतरता के अंतर का आईना है।
भारत में कंपनियां तो बन रही हैं, लेकिन वैश्विक दिग्गज कितने बन रहे हैं?
यही असली सवाल है।
भारत ने बड़ी संख्या में यूनिकॉर्न खड़े किए हैं। अरबों डॉलर के मूल्यांकन वाली कंपनियां हमारे सामने हैं। लेकिन कंपनी का मूल्यांकन और उसका वास्तविक कारोबार एक ही चीज नहीं है। फॉर्च्यून 500 में जगह पाने के लिए केवल ऊंची कीमत पर बिकने वाली कंपनी नहीं, बल्कि अरबों डॉलर का वास्तविक राजस्व पैदा करने वाली, बड़े बाजार में काम करने वाली और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाली कंपनी चाहिए।
भारत की समस्या यह है कि हमने कई क्षेत्रों में कंपनियां तो पैदा कीं, लेकिन उन्हें विश्वस्तरीय आकार तक पहुंचाने की रणनीति अभी अधूरी है।
दक्षिण कोरिया का चेबोल मॉडल, जापान का कीरेत्सु ढांचा और चीन की सरकारी औद्योगिक नीति तीन अलग-अलग रास्ते हैं, लेकिन तीनों में एक समान बात दिखाई देती है—सरकार ने केवल नियम बनाने की भूमिका नहीं निभाई, उसने पूंजी, बुनियादी ढांचा, तकनीकी क्षमता, निर्यात और रणनीतिक क्षेत्रों को मजबूत करने में सक्रिय भूमिका निभाई।
भारत को इन मॉडलों की नकल नहीं करनी चाहिए। लेकिन उनसे सीखने से भी नहीं भागना चाहिए।
भारत में सरकार अक्सर उद्योग से कहती है कि वैश्विक बनिए। उद्योग कहता है कि नीतियां स्थिर रखिए। सरकार कहती है कि निवेश बढ़ाइए। उद्योग पूछता है कि मांग कहां है। सरकार कहती है कि निर्यात कीजिए। उद्योग कहता है कि लागत और प्रतिस्पर्धा की समस्या दूर कीजिए।
इस चक्र को तोड़ना होगा।
50 कंपनियां चाहिए तो 50 नीतियां नहीं, एक आर्थिक दृष्टि चाहिए
फॉर्च्यून 500 की 50 कंपनियां केवल सरकारी घोषणा से पैदा नहीं होंगी। इसके लिए ऐसे उद्योग चाहिए जो अगले 10-20 वर्षों के लिए बड़े निवेश का जोखिम उठा सकें।
भारत को यह तय करना होगा कि उसके अगले वैश्विक दिग्गज कौन से क्षेत्रों से निकलेंगे—इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, ऊर्जा, औषधि, जैव प्रौद्योगिकी, वाहन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, दूरसंचार, वित्तीय सेवाएं या कोई बिल्कुल नया क्षेत्र।
लेकिन केवल क्षेत्र तय करने से काम नहीं चलेगा।
पूरी आपूर्ति शृंखला भारत में बनानी होगी।
यदि भारत केवल अंतिम उत्पाद जोड़ने वाला देश बनकर रह गया, तो वैश्विक कंपनियां यहां तो बनेंगी, लेकिन वैश्विक मूल्य का बड़ा हिस्सा कहीं और चला जाएगा। असली ताकत तब आएगी जब भारत डिजाइन करेगा, तकनीक विकसित करेगा, बौद्धिक संपदा बनाएगा, उत्पादन करेगा, ब्रांड बनाएगा और दुनिया को बेचेगा।
आज भी कई भारतीय कंपनियां वैश्विक कंपनियों के लिए सेवा प्रदाता या कुशल निर्माता बनने में सफल हैं। यह उपलब्धि कम नहीं है। लेकिन अगला कदम इससे बहुत बड़ा है।
दुनिया को भारतीय कंपनी के लिए भुगतान करना होगा, भारतीय कंपनी को दुनिया की कंपनी के लिए काम करने के लिए नहीं।
घरेलू पूंजी के बिना वैश्विक छलांग मुश्किल
दूसरी बड़ी चुनौती पूंजी की है।
फॉर्च्यून 500 स्तर की कंपनियां छोटी पूंजी से नहीं बनतीं। उन्हें वर्षों तक भारी निवेश चाहिए। शोध पर खर्च चाहिए। कारखाने चाहिए। वैश्विक अधिग्रहण करने की क्षमता चाहिए। नई तकनीक पर लगातार पैसा लगाना होगा।
इसलिए भारत को अपने घरेलू पूंजी बाजार को और गहरा करना होगा।
यदि भारतीय कंपनियों को हर बड़े विस्तार के लिए विदेशी पूंजी की तरफ देखना पड़ेगा, तो वैश्विक महत्वाकांक्षा कमजोर पड़ सकती है। देश के बैंक, बीमा कंपनियां, पेंशन फंड, निवेश संस्थाएं और घरेलू निवेशक ऐसी दीर्घकालिक पूंजी उपलब्ध कराने में सक्षम होने चाहिए जो कंपनियों को धैर्य के साथ बड़ा होने दे।
लेकिन यहां सावधानी भी जरूरी है।
सरकार को चुनिंदा कंपनियों को केवल राजनीतिक निकटता के आधार पर बड़ा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। राष्ट्रीय चैंपियन और राजनीतिक चहेते में बहुत अंतर होता है।
सरकार का काम मैदान तैयार करना है; दौड़ कौन जीतेगा, यह बाजार और प्रदर्शन तय करें।
एमएसएमई से वैश्विक कंपनी तक का रास्ता
भारत की एक और बड़ी कमजोरी यह है कि हमारी लाखों छोटी कंपनियां बड़े स्तर तक पहुंचने से पहले ही बिखर जाती हैं।
एक छोटी कंपनी को बड़ी कंपनी बनने के लिए केवल ऋण नहीं चाहिए। उसे तकनीक, प्रबंधन, बाजार, निर्यात नेटवर्क, गुणवत्ता प्रमाणन, कुशल कर्मचारी और स्थिर मांग चाहिए।
सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें सफल एमएसएमई अगले चरण में जाने से डरे नहीं।
क्योंकि अगली फॉर्च्यून 500 कंपनी जरूरी नहीं कि आज की बड़ी कंपनी ही हो। वह आज की छोटी या मध्यम कंपनी भी हो सकती है।
लेकिन इसके लिए कारोबार बढ़ाने पर अनावश्यक नियामकीय बोझ कम करना होगा। राज्यों के बीच कारोबारी नियमों की जटिलता घटानी होगी और कंपनियों को बड़े स्तर पर निवेश करने का भरोसा देना होगा।
सबसे बड़ा संकट—हमारी महत्वाकांक्षा का आकार
भारत की सबसे बड़ी समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि कई बार महत्वाकांक्षा की सीमा होती है।
हम दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की बात करते हैं, लेकिन क्या हमारे उद्योगों का लक्ष्य भी दुनिया के सबसे बड़े उद्योग समूहों में शामिल होना है?
यदि भारतीय कंपनी का लक्ष्य केवल देश के बाजार में नंबर एक बनना है, तो वह वैश्विक दिग्गज कैसे बनेगी?
दुनिया का बाजार जीतने की मानसिकता पैदा करनी होगी।
कंपनियों को मांग बढ़ने का इंतजार करने के बजाय पहले निवेश करना होगा। अनुसंधान और विकास पर खर्च करना होगा। वैश्विक प्रतिभा को आकर्षित करना होगा। विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा के साथ साझेदारी भी करनी होगी। जरूरत पड़े तो दुनिया की कंपनियों का अधिग्रहण करना होगा।
और सबसे महत्वपूर्ण—भारतीय ब्रांड बनाने होंगे।
भारत को केवल ‘दुनिया का कारखाना’ बनने से आगे बढ़कर ‘दुनिया का ब्रांड निर्माता’ बनना होगा।
मोदी का लक्ष्य सरकार की परीक्षा भी है और उद्योग की भी
प्रधानमंत्री ने इस लक्ष्य को केवल सरकार की परियोजना न मानकर केंद्र, राज्यों और उद्योग की साझा राष्ट्रीय परियोजना से जोड़ने की बात कही है। यही इस लक्ष्य की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
क्योंकि यदि दिल्ली नीति बनाए और राज्य स्तर पर जमीन, बिजली, परिवहन, कर व्यवस्था और अनुमति की बाधाएं बनी रहें, तो वैश्विक कंपनी नहीं बन सकती।
यदि सरकार बुनियादी ढांचा दे लेकिन उद्योग शोध पर खर्च न करे, तो भी लक्ष्य अधूरा रहेगा।
यदि उद्योग जोखिम उठाए लेकिन नीतियां बार-बार बदलती रहें, तो निवेशक पीछे हटेगा।
इसलिए अब जिम्मेदारी दोनों की है।
सरकार को सुविधा देनी होगी और उद्योग को साहस दिखाना होगा।
भारत के पास बाजार है। युवा आबादी है। प्रतिभा है। तकनीकी क्षमता है। डिजिटल आधारभूत ढांचा है। वैश्विक स्तर पर सफल भारतीय प्रबंधक और उद्यमी हैं।
फिर भी 50 फॉर्च्यून 500 कंपनियां अपने आप नहीं बनेंगी।
इसके लिए अगले दशक की आर्थिक नीति का केंद्र केवल ‘कितना निवेश आया’ नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि ‘भारत से कितनी विश्वस्तरीय कंपनियां निकलीं।’
नौ से 50 तक का सफर केवल 41 कंपनियां जोड़ने का गणित नहीं है।
यह भारत की आर्थिक सोच को छोटे बाजार से वैश्विक बाजार, सेवा प्रदाता से ब्रांड निर्माता और उत्पादन केंद्र से तकनीकी नेतृत्वकर्ता में बदलने की चुनौती है।
प्रधानमंत्री ने सपना दिखा दिया है। अब असली परीक्षा शुरू होती है।
क्योंकि लाल किले से कही गई महत्वाकांक्षा तब इतिहास बनेगी, जब भारतीय कंपनियां दुनिया की सूची में सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति बनकर दिखाई देंगी। वरना 50 कंपनियों का सपना भी स्वतंत्रता दिवस के भाषण की एक और बड़ी घोषणा बनकर रह जाएगा।

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