प्रणव बजाज
भोपाल में इन दिनों मौसम से ज्यादा तेजी से मोहन सरकार की राजनीतिक हवाएं बदल रही हैं। सुबह कोई नियुक्ति चर्चा में होती है, दोपहर में मंत्रिमंडल फेरबदल की खबर उड़ती है और शाम तक किसी नए चेहरे को भविष्य का दावेदार बना दिया जाता है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर डॉ. मोहन यादव जरूर बैठे हैं, लेकिन सियासी गलियारों में सवाल घूम रहा है—फैसले भी यहीं होते हैं या उनका मौसम कहीं और बनता है?
मोहन सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह है कि उसने राजनीति को इतना रोमांचक बना दिया है कि मंत्री अपना विभाग कम और अपनी कुर्सी का भविष्य ज्यादा देखने लगे हैं। किसका नंबर आएगा, किसका टिकट कटेगा, किसे मौका मिलेगा—सरकार से ज्यादा चर्चा इन सवालों की है।
और बेचारे पुराने कार्यकर्ता! चुनाव में बूथ से लेकर सड़क तक पार्टी का झंडा उठाते रहे। अब जब निगम-मंडल और आयोगों में पद बांटने की बारी आई तो उनकी निष्ठा की फाइल शायद ‘विचाराधीन’ हो गई। लगता है सरकार में अनुभव की कोई एक्सप्रेस ट्रेन नहीं चलती—जिसका सिग्नल पहले मिला, वही प्लेटफॉर्म पर।
मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चा ने तो अलग ही तमाशा खड़ा कर दिया है। छह मंत्री जाएंगे या नहीं जाएंगे, नए चेहरे आएंगे या नहीं आएंगे—इसका जवाब किसी के पास नहीं। लेकिन माननीयों की बेचैनी देखकर लगता है कि सरकारी कैलेंडर से ज्यादा महत्वपूर्ण अब राजनीतिक अफवाहों का कैलेंडर हो गया है।
मोहन जी के सामने असली चुनौती विपक्ष नहीं, शायद यही है कि सरकार के फैसले पर भरोसा पहले हो और खबर बाद में।
इधर एक मंत्री को भविष्य का मुख्यमंत्री बनने की बधाई मिलने की चर्चा है। मुख्यमंत्री वर्तमान में मोहन यादव हैं, भविष्य का फैसला पार्टी करेगी—लेकिन मध्यप्रदेश की राजनीति में भविष्य की मिठाई वर्तमान की चाय से पहले बंटने लगी है।
यह दृश्य अपने आप में बड़ा व्यंग्य है।
कुर्सी पर मोहन जी बैठे हैं और शुभकामनाएं किसी और के भविष्य के नाम चल रही हैं!
अब सवाल यह नहीं कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा। सवाल यह है कि मोहन सरकार में वर्तमान कितना लंबा है और भविष्य कितनी जल्दी शुरू हो जाता है?
और यही वह जगह है जहां मोहन सरकार पर सबसे तीखा सवाल खड़ा होता है—क्या सरकार की दिशा मुख्यमंत्री तय कर रहे हैं, संगठन तय कर रहा है, दिल्ली तय कर रही है या फिर हर दिन चलने वाली राजनीतिक चर्चा?
क्योंकि अगर हर फैसले से पहले अटकलें चलें, हर नियुक्ति पर सवाल उठें, हर मंत्री अपनी कुर्सी नापे और हर दूसरे दिन नेतृत्व के भविष्य की चर्चा हो, तो जनता पूछेगी ही—
मोहन जी, सरकार चला रहे हैं या मध्यप्रदेश को ‘सस्पेंस सीरीज’ का नया सीजन दिखा रहे हैं?
पांच साल की सरकार में जनता को पांच साल का रोडमैप चाहिए।
हर हफ्ते नया ट्विस्ट नहीं।

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