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कर्ज पर कर्ज! एमपी के खजाने पर फिर ₹3600 करोड़ का बोझ, सवाल ...मोहन सरकार बताए, कर्ज का हिसाब जनता को कब?”

 

प्रणव बजाज


भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने एक बार फिर बाजार का दरवाजा खटखटाया है। राज्य के लिए ₹3,600 करोड़ की नई बाजार उधारी की प्रक्रिया पूरी हुई है। इसमें ₹1,600 करोड़ की 18 साल की प्रतिभूति पर 7.61 प्रतिशत प्रतिफल रहा, जबकि ₹2,000 करोड़ की 30 साल की प्रतिभूति भी बाजार से जुटाई गई। यानी सरकार आज पैसा ले रही है और उसकी बड़ी कीमत आने वाले वर्षों के बजट को चुकानी होगी।



यह केवल ₹3,600 करोड़ का सवाल नहीं है। असली सवाल है—सरकार को बार-बार कर्ज लेने की जरूरत क्यों पड़ रही है और इस पैसे का इस्तेमाल किस मद में होगा? 2026-27 के बजट में ही मध्यप्रदेश ने ₹1,06,190 करोड़ की कुल उधारी का अनुमान रखा है। इसमें शुद्ध उधारी ₹71,753 करोड़ बताई गई है। राजकोषीय घाटा ₹71,458 करोड़ यानी सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 3.9 प्रतिशत अनुमानित है।


बजट दस्तावेजों के अनुसार 2026-27 के अंत तक राज्य की बकाया देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद के करीब 32.5 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। दिसंबर 2025 तक राज्य की सरकारी गारंटियां भी करीब ₹48,430 करोड़ आंकी गई थीं। यानी कर्ज की तस्वीर केवल बाजार से लिए जा रहे ऋण तक सीमित नहीं है।


सरकार कर्ज को विकास और योजनाओं के लिए जरूरी बताती है, लेकिन जनता का सवाल सीधा है—कर्ज लेकर खर्च करने की सीमा आखिर कहां है? आज सरकार प्रतिभूतियां जारी करती है, कल इनका मूलधन और ब्याज चुकाना होगा। पैसा आखिरकार सरकारी राजस्व से जाएगा और सरकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा जनता से आने वाले करों से बनता है।


यानी सवाल यह नहीं कि सरकार कर्ज क्यों ले रही है। सवाल यह है कि कर्ज से बनी व्यवस्था कितनी आय पैदा कर रही है और कितनी सिर्फ खर्च का बोझ बढ़ा रही है?


जनता के नाम सबसे बड़ा सवाल


अगर आज का खर्च भविष्य की सरकारों और taxpayers के कंधे पर डाला जा रहा है, तो सरकार को हर नई उधारी के साथ यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि ₹3,600 करोड़ कहां खर्च होंगे, उससे कितनी संपत्ति बनेगी, कितनी आय पैदा होगी और ब्याज समेत कुल कितनी रकम लौटानी पड़ेगी।


कर्ज लेना आसान है, लेकिन उसकी कीमत जनता और आने वाली पीढ़ियां चुकाती हैं।

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