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चातुर्मास में हुआ बच्चे का जन्म, तो नामकरण संस्कार कब करें? दूर करें कंफ्यूजन

 

घर में बच्चे की किलकारी गूंजते ही परिवार में खुशी का माहौल बन जाता है, लेकिन अगर जन्म चातुर्मास के दौरान हुआ हो तो कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या नामकरण संस्कार भी देवउठनी एकादशी तक टाल देना चाहिए?



धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका जवाब हर स्थिति में ‘नहीं’ है। चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश जैसे बड़े मांगलिक कार्यों को टालने की परंपरा है, लेकिन बच्चे का नामकरण एक आवश्यक संस्कार माना जाता है। इसलिए कई परंपराओं में जन्म के बाद सूतक की अवधि पूरी होने पर नामकरण किया जा सकता है। 


आमतौर पर नामकरण संस्कार जन्म के 10वें, 11वें या 12वें दिन करने की परंपरा मिलती है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों, परिवारों और धार्मिक परंपराओं में समय अलग हो सकता है। कुछ परिवार 16वें या अन्य शुभ दिन पर भी यह संस्कार करते हैं। 


धार्मिक विद्वानों के अनुसार, यदि चातुर्मास के दौरान नामकरण करना हो तो इसे सादगी से घर पर पूजा-पाठ के साथ किया जा सकता है। लेकिन यदि परिवार बड़ा समारोह आयोजित करना चाहता है, तो उसे देवउठनी एकादशी के बाद रखने की परंपरा अपनाई जा सकती है।


नामकरण के लिए बच्चे की जन्मतिथि, समय और जन्म नक्षत्र के आधार पर नाम का पहला अक्षर भी तय किया जाता है। इसलिए अंतिम निर्णय से पहले अपने परिवार की परंपरा और योग्य पंडित या आचार्य की सलाह लेना उचित माना जाता है।


यानी चातुर्मास में बच्चे का जन्म होने पर नामकरण संस्कार रोकना जरूरी नहीं, लेकिन परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि तय करना बेहतर है।

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