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बारूद से नहीं, बातचीत से तय होगी नई विश्व व्यवस्था! दिल्ली ने बदला शक्ति संतुलन का व्याकरण

 

संपादकीय | प्रणव बजाज


तीन दिन, 15 द्विपक्षीय बैठकें और उन मुलाकातों की अलग कहानी, जो किसी आधिकारिक कार्यक्रम में दर्ज नहीं होतीं। 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की असली तस्वीर घोषणापत्र के पैराग्राफों में नहीं, भारत मंडपम की उन मेजों और गलियारों में दिखाई दी, जहां विरोधी हितों वाले देश एक-दूसरे के सामने बैठे, बहस की और फिर भी संवाद का रास्ता बंद नहीं किया।



यही दिल्ली की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है।


दुनिया लंबे समय से शक्ति को दो चीजों से मापती रही है—बारूद और पैसा। लेकिन दिल्ली ने संकेत दिया कि तीसरी ताकत भी होती है—संवाद की क्षमता। जिस दुनिया में युद्ध चल रहे हैं, प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं और व्यापार को हथियार बनाया जा रहा है, वहां एक ही मंच पर असहमत देशों का बैठना मामूली बात नहीं है।


पश्चिम एशिया इसका उदाहरण है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व की मुलाकात ऐसे समय हुई, जब क्षेत्रीय मतभेद मौजूद हैं। संदेश साफ था—मतभेद रिश्ते खत्म करने की अनिवार्यता नहीं हैं।


शी जिनपिंग का ‘ताकत ही अधिकार है’ वाले तर्क पर हमला केवल वॉशिंगटन के लिए संदेश नहीं था। यह उस वैश्विक व्यवस्था पर भी सवाल है जिसमें शक्तिशाली देश नियमों की व्याख्या अपने हित में करते हैं। लेकिन यहां एक असहज सवाल भी है—क्या चीन स्वयं इस कसौटी पर खरा उतरेगा?


भारत ने महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीक के हथियारीकरण पर चेताया। यह बात उस मंच पर कही गई जहां चीन मौजूद था, क्योंकि महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक आपूर्ति में चीन की भूमिका निर्णायक है। दिल्ली ने नाम लेकर टकराव नहीं चुना, लेकिन संकेत इतना साफ था कि उसे पढ़ने के लिए किसी अनुवाद की जरूरत नहीं।


व्यापार पर भी यही रणनीति दिखाई दी। एकतरफा शुल्कों पर चिंता दर्ज हुई, मगर किसी देश का नाम नहीं लिया गया। यह कमजोरी नहीं, कूटनीति की भाषा है। नाम लेने से मंच खेमे में बदल जाता, संकेत देने से बातचीत का दरवाजा खुला रहता है।


दिल्ली ने एजेंडा बनाया, अब बीजिंग की परीक्षा


सबसे महत्वपूर्ण बात आगे की है। 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता चीन के पास होगी और अगला शिखर सम्मेलन भी चीन में होगा। यानी दिल्ली ने जिस एजेंडे को आगे बढ़ाया, अब उसे लागू करने की परीक्षा बीजिंग की होगी।


प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक शासन सुधार के लिए प्रतिनिधित्व, प्रतिक्रियाशीलता और नियम-निर्माण को आधार बनाने का सुझाव दिया। सुरक्षा परिषद सुधार पर भारत की मांग भी स्पष्ट है—सिर्फ चर्चा नहीं, समयबद्ध और ठोस परिणाम।


दूसरी तरफ शी जिनपिंग ने ब्रिक्स एआई ओपन-सोर्स कम्युनिटी का प्रस्ताव रखा। इसका अर्थ साफ है—भविष्य की लड़ाई सिर्फ तकनीक बनाने की नहीं, तकनीक के नियम बनाने की भी है।


महत्वपूर्ण खनिजों पर भारत की चिंता भी अब भाषण से आगे जानी चाहिए। अगर आपूर्ति शृंखला को हथियार बनाया जा सकता है तो उसके लिए वैकल्पिक और विश्वसनीय तंत्र भी बनना चाहिए।


मोदी ने खुद कहा कि दुनिया अब केवल विचार और वादे नहीं, ठोस परिणाम चाहती है। यही बात अब ब्रिक्स पर लागू होगी।


असल परीक्षा घोषणापत्र की नहीं, अगले साल की होगी


ब्रिक्स के भीतर सभी देशों के हित एक जैसे नहीं हैं। भारत-चीन सीमा विवाद से लेकर हिंद महासागर की प्रतिस्पर्धा तक कई प्रश्न मौजूद हैं। ऐसे में ब्रिक्स को एक समान विचारधारा वाला गुट मानना वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा।


लेकिन शायद यही इसकी उपयोगिता भी है।


अगर विरोधी देश युद्ध के बावजूद बातचीत कर सकते हैं, तो कूटनीति के लिए जगह बची हुई है।


दिल्ली सम्मेलन की सबसे बड़ी सीख यही है—नई विश्व व्यवस्था किसी एक महाशक्ति के आदेश से नहीं बनेगी। वह उन मेजों पर बनेगी, जहां असहमति के बावजूद देश उठकर चले नहीं जाते।


अब गेंद बीजिंग के पाले में है।


दिल्ली ने एजेंडा लिख दिया है। 2027 बताएगा कि चीन उसे आगे बढ़ाता है या ब्रिक्स फिर घोषणाओं के एक और दस्तावेज में बदल जाता है।

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