इंदौर । बौद्धिक प्रतिकार
इंदौर का सुमति धाम अब केवल धार्मिक स्थल नहीं रह गया है। बड़े धार्मिक आयोजनों, संतों के चातुर्मास और सामाजिक संसद की गतिविधियों के कारण यह जैन समाज की प्रभावशाली गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन चुका है। सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार 2026 में मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के वर्षायोग के लिए दिगंबर जैन सामाजिक संसद और समाज के प्रमुख प्रतिनिधियों ने विशेष प्रयास किए। सूत्रों के अनुसार इनमें आनंद गोधा और अन्य जैन पदाधिकारियों की भूमिका का उल्लेख मिलता है। यह समाज के बड़े ठेकेदार है। जो समाज कीपुरी सत्ता चलाते हैं।
सवाल आस्था पर नहीं है। सवाल उस सिस्टम पर है जिसमें समाज के बड़े कारोबारी, रियल एस्टेट से जुड़े लोग और वरिष्ठ ठेकेदार सामाजिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचते हैं और फिर वही लोग धार्मिक आयोजनों की व्यवस्थाओं में भी प्रभावशाली दिखाई देते हैं।
2025 के सुमति धाम आयोजन की सार्वजनिक जानकारी बताती है कि आयोजन का पैमाना कितना बड़ा था—हजारों श्रद्धालुओं की व्यवस्था, बड़े पंडाल, भोजनशालाएं, एलईडी, ड्रोन और अन्य व्यवस्थाओं की योजना सार्वजनिक रूप से बताई गई थी।
ऐसे में समाज के भीतर उठने वाला सबसे जायज सवाल है—आयोजन में कुल कितना पैसा आया? किससे आया? किस मद में कितना खर्च हुआ? दान और चंदे का ऑडिट हुआ या नहीं? और यदि किसी संत के नाम पर समाज से धन जुटाया गया तो उसका सार्वजनिक हिसाब समाज के सामने क्यों नहीं रखा जाता?
यह सवाल किसी संत की आस्था या प्रतिष्ठा के खिलाफ नहीं, बल्कि पारदर्शिता के पक्ष में है।
सुमति धाम की अपनी वेबसाइट भी इसे सेवा, सामाजिक उत्थान और जैन मूल्यों से जुड़ा संस्थान बताती है। ऐसे में पारदर्शिता की कसौटी भी उतनी ही ऊंची होनी चाहिए।
अब जरूरत है कि समाज के वरिष्ठ लोग आगे आएं और साफ बताएं—धर्म के मंच पर प्रभाव बड़ा है या जवाबदेही?
क्योंकि धर्म की सबसे बड़ी ताकत श्रद्धा है, और श्रद्धा की सबसे बड़ी सुरक्षा—हिसाब में ईमानदारी।

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