लखनऊ। उत्तर प्रदेश की 2027 की सियासत अभी चुनावी रण में पूरी तरह उतरी भी नहीं है, लेकिन दलित राजनीति में नई हलचल दिखाई देने लगी है। स्विट्जरलैंड से लौटने के बाद डॉ. रोहिणी घावरी ने उत्तर प्रदेश में सक्रिय होने का संकेत दिया है। उनका फोकस खास तौर पर वाल्मीकि समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की करीब 21 विधानसभा सीटों को लेकर उन्होंने अपनी रणनीति सामने रखी है।
यहीं से सवाल बड़ा हो जाता है—क्या रोहिणी घावरी की सियासी सक्रियता चंद्रशेखर आजाद के प्रभाव वाले इलाके में नया वोट समीकरण खड़ा कर सकती है?
चंद्रशेखर आजाद नगीना से लोकसभा सांसद हैं और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने नगीना सीट बड़े अंतर से जीती थी। ऐसे में पश्चिमी यूपी में दलित राजनीति का कोई नया चेहरा उभरता है तो उसका राजनीतिक असर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
रोहिणी की रणनीति हालांकि सिर्फ चंद्रशेखर विरोध तक सीमित दिखाई नहीं देती। वह वाल्मीकि समाज को राजनीतिक नेतृत्व में अधिक हिस्सेदारी देने की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि समाज को लंबे समय से मुख्य रूप से सफाईकर्मी की पहचान तक सीमित रखा गया, जबकि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उसकी हिस्सेदारी बढ़नी चाहिए। उन्होंने आने वाले वर्षों में वाल्मीकि समाज से मुख्यमंत्री बनाए जाने का लक्ष्य भी सामने रखा है।
यही बात यूपी की दलित राजनीति के पुराने समीकरण को चुनौती दे सकती है।
दलित राजनीति में जाटव वोट लंबे समय से निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। लेकिन अगर वाल्मीकि समाज अलग राजनीतिक पहचान और नेतृत्व की मांग के साथ संगठित होता है, तो पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर नए समीकरण बन सकते हैं।
रोहिणी और चंद्रशेखर के बीच व्यक्तिगत विवाद भी सार्वजनिक हो चुका है। रोहिणी ने चंद्रशेखर पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि उपलब्ध रिपोर्टों में इस मामले पर चंद्रशेखर पक्ष का जवाब शामिल नहीं है। इसलिए इन आरोपों को फिलहाल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।
अब असली सवाल यह है कि रोहिणी की लड़ाई व्यक्तिगत विवाद से आगे बढ़कर क्या स्थायी राजनीतिक आंदोलन बन पाएगी?
अगर वह वाल्मीकि समाज को संगठित करने, महिलाओं और युवाओं को जोड़ने और जमीनी संगठन खड़ा करने में सफल होती हैं, तो 2027 में उनका असर सिर्फ एक नए चेहरे की एंट्री तक सीमित नहीं रहेगा।
यूपी की दलित सियासत में मुकाबला अब सिर्फ यह नहीं होगा कि कौन बड़ा नेता है; सवाल यह भी होगा कि किसके साथ कौन-सा सामाजिक समूह खड़ा है। और इसी मोर्चे पर रोहिणी घावरी की एंट्री को चंद्रशेखर आजाद के लिए संभावित चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

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