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सुधारों की अगली मंजिल बड़े उद्योग नहीं, छोटा कारोबारी हो

 


करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी सड़क किनारे खड़ी है, मगर व्यवस्था की नजर में वही अतिक्रमण है


प्रणव बजाज : सम्पादकीय


भारत की अर्थव्यवस्था पर चर्चा होते ही बड़े उद्योग, बड़े निवेश और बड़ी परियोजनाओं की तस्वीर सामने आती है। लेकिन देश की असली आर्थिक धड़कन उस चाय वाले, सब्जी विक्रेता, दर्जी, मैकेनिक, कारीगर, छोटे भोजनालय संचालक और घर से कारोबार करने वाले व्यक्ति में है, जो बिना किसी बड़े निवेश या सरकारी संरक्षण के अपने परिवार के साथ-साथ दूसरों के लिए भी रोजगार पैदा करता है।



विडंबना देखिए—बड़े उद्योगों के लिए जमीन, औद्योगिक क्षेत्र, ऋण और तमाम प्रशासनिक सुविधाएं जुटाई जाती हैं, लेकिन छोटे कारोबारी को अक्सर कारोबार करने के लिए चार फुट जगह तक नसीब नहीं होती। वह सड़क किनारे बैठता है तो अतिक्रमणकारी, ठेला लगाता है तो अवैध और दुकान बढ़ाता है तो कार्रवाई का पात्र बन जाता है। सवाल यह है कि क्या शहर की योजना बनाते समय सरकार ने यह मान लिया था कि गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लोग कारोबार करेंगे ही नहीं?


यह सोच बदलनी होगी।


भारत में रोजगार की चुनौती अब केवल नौकरी पैदा करने की नहीं, बल्कि स्वरोजगार और छोटे कारोबार को टिकाऊ बनाने की है। आर्थिक वृद्धि बढ़ रही है, लेकिन उसके अनुपात में रोजगार नहीं बढ़ रहा। ऐसे में करोड़ों छोटे कारोबारियों को व्यवस्था के हाशिये पर रखना आर्थिक नीति की गंभीर भूल है।


छोटे और मझोले शहरों में आबादी के अनुपात से नियोजित छोटे बाजार, व्यापार क्षेत्र और कामकाजी स्थल क्यों नहीं बनाए जा सकते? मामूली शुल्क पर बिजली, पानी, स्वच्छता और कचरा प्रबंधन उपलब्ध कराया जाए। कारोबारी को बैंकिंग, छोटे ऋण, बीमा और डिजिटल भुगतान से जोड़ा जाए। इससे व्यापारी भी सुरक्षित होगा और नगरपालिकाओं को नियमित राजस्व भी मिलेगा।


सरकार यदि नए उद्यमी को कारोबार शुरू करने के लिए सुविधाएं देने की बात करती है, तो उस व्यक्ति को क्यों भूल जाती है जिसने वर्षों पहले अपने दम पर कारोबार शुरू किया और बिना किसी सरकारी नौकरी के अपने लिए रोजगार बनाया?


अब यह भ्रम भी छोड़ना होगा कि केवल बड़े उद्योग ही रोजगार का समाधान हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के दौर में सेवा क्षेत्र की अनेक पारंपरिक नौकरियां बदल रही हैं। ऐसे समय में स्थानीय छोटे कारोबार रोजगार की सुरक्षा-जाल बन सकते हैं।


साथ ही नकदी अर्थव्यवस्था को अपराध की नजर से देखना बंद करना होगा। हर नकद लेन-देन काला धन नहीं होता। छोटे कारोबारी और निम्न आय वाले परिवार आज भी नकदी पर निर्भर हैं। जरूरत उन्हें डराने की नहीं, बल्कि सुरक्षित बैंकिंग और छोटे बचत साधनों से जोड़ने की है।


बड़ा उद्योग अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाता है, लेकिन छोटा कारोबार उस वृद्धि को करोड़ों परिवारों की थाली तक पहुंचाता है।


इसलिए अगले आर्थिक सुधारों का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बड़े उद्योगों को और क्या सुविधा दी जाए। असली सवाल यह होना चाहिए—


जिस छोटे कारोबारी ने बिना सरकार से नौकरी मांगे अपने लिए रोजगार बनाया, सरकार ने उसके लिए क्या बनाया?


अगर इस सवाल का जवाब नहीं है, तो आर्थिक सुधार अधूरे हैं।

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