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रिकॉर्ड में गणेशजी, सौदे में निजी मालिक!

 

सर्वे 491 की जमीन पर बड़ा खुलासा: भट्ट परिवार के पांच नाम, प्रह्लाद-प्रकाश के साथ एग्रीमेंट; अब कलेक्टर बताएंगे असली मालिक कौन?


प्रणव बजाज


इंदौर : विश्व प्रसिद्ध खजराना गणेश मंदिर की जमीन को लेकर सामने आए दस्तावेजों ने इंदौर प्रशासन और राजस्व विभाग के सामने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला अब महज जमीन के स्वामित्व का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि उन रिकॉर्डों की सच्चाई तक पहुंचने का मामला बन गया है, जिनमें एक तरफ जमीन का संबंध खजराना गणेश मंदिर से बताया गया है, वहीं दूसरी ओर उसी जमीन पर निजी स्वामित्व का दावा कर सौदे किए जाने की बात सामने आई है। बौद्धिक प्रतिकार की विशेष पड़ताल में प्रकाशित दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड और विक्रय अनुबंध से जुड़े तथ्यों को एक साथ जोड़ने पर कई ऐसे सवाल खड़े होते हैं, जिनका जवाब अब जिला प्रशासन को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।



मामले की पूरी कहानी सर्वे नंबर 491 से शुरू होती है। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 1994-95 और 1998-99 के राजस्व रिकॉर्ड में इस जमीन का संबंध श्री खजराना गणेश मंदिर, व्यवस्थापक कलेक्टर इंदौर से दर्ज होने की बात सामने आई है। यही रिकॉर्ड अब पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन गया है। सवाल यह है कि यदि पुराने राजस्व अभिलेखों में जमीन मंदिर और कलेक्टर व्यवस्थापक के नाम से दर्ज थी तो बाद के वर्षों में उस पर निजी स्वामित्व का दावा किस आधार पर किया गया? क्या राजस्व रिकॉर्ड में कोई वैधानिक परिवर्तन हुआ था? यदि हुआ तो किस अधिकारी के आदेश से और किस दस्तावेज के आधार पर?


मामले को और गंभीर बनाता है जमीन के संबंध में सामने आया वह विक्रय अनुबंध, जिसमें भट्ट परिवार के सदस्यों मनोहरलाल भट्ट, मोहनलाल भट्ट, प्रह्लाद भट्ट, भालचंद्र भट्ट और अनिता भट्ट के नाम सामने आए हैं। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इन नामों से जमीन पर मालिकाना दावा करते हुए सौदे की प्रक्रिया की गई। दस्तावेजों में प्रह्लाद और प्रकाश के नाम भी जमीन के सौदे से जुड़े बताए गए हैं। रिपोर्ट में जमीन का सौदा करीब तीन लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से तय होने और लगभग 1.61 लाख रुपए अग्रिम राशि दिए जाने का उल्लेख है। शेष राशि मासिक किश्तों में दिए जाने की शर्त का भी उल्लेख सामने आया है।


यहीं से पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—रिकॉर्ड में यदि जमीन मंदिर की थी तो निजी व्यक्तियों ने उसे अपनी संपत्ति बताकर सौदे कैसे किए? और यदि जमीन वास्तव में निजी थी तो पुराने राजस्व रिकॉर्ड में खजराना गणेश मंदिर तथा व्यवस्थापक कलेक्टर का नाम क्यों दर्ज था? इस सवाल का जवाब किसी मौखिक बयान से नहीं, बल्कि मूल दस्तावेजों से मिलेगा। प्रशासन को अब वर्षवार खसरा, खतौनी, बी-वन, नामांतरण आदेश, बंदोबस्त रिकॉर्ड और जमीन से संबंधित सभी रजिस्ट्रियां सार्वजनिक करनी चाहिए।


प्रकाशित रिपोर्टों में इस जमीन का रकबा भी जांच का विषय बन गया है। एक जगह जमीन 4.16 एकड़ बताई गई है, जबकि दूसरी रिपोर्ट में 4.21 एकड़ का उल्लेख है। आखिर रकबे में यह अंतर कैसे आया? क्या यह केवल दस्तावेजी त्रुटि है या फिर अलग-अलग समय में जमीन के रिकॉर्ड में परिवर्तन हुआ? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि इसी जमीन पर कॉलोनी विकसित कर बड़ी संख्या में प्लॉट बेचे गए।


मामले में मायापुरी और राधाकृष्णबाग नाम से कॉलोनियां विकसित किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। प्रकाशित जानकारी के अनुसार करीब 102 प्लॉट काटकर बेचे जाने की बात कही गई है। यदि जमीन का स्वामित्व ही विवादित था तो उस पर कॉलोनी विकसित करने की अनुमति किस आधार पर दी गई? नक्शा किस विभाग ने मंजूर किया? प्लॉटों की बिक्री किस अधिकार के तहत हुई? नगर निगम और विकास से जुड़े विभागों ने इस जमीन के संबंध में क्या जांच की? ये सभी सवाल अब प्रशासनिक जांच का विषय हैं।


खजराना क्षेत्र की जमीनों को लेकर केवल सर्वे नंबर 491 ही चर्चा में नहीं है। प्रकाशित रिपोर्टों में सर्वे नंबर 579 और सर्वे नंबर 1074 का भी उल्लेख है। सर्वे नंबर 579 का रकबा 0.2990 हेक्टेयर बताया गया है, जबकि सर्वे नंबर 1074 का रकबा 0.5260 हेक्टेयर होने और उस क्षेत्र का संबंध खजराना गणेश मंदिर से होने का उल्लेख सामने आया है। इन सभी सर्वे नंबरों का वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए, ताकि वर्षों से चल रहे विवाद और आरोपों की वास्तविक स्थिति साफ हो सके।


इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि शिकायतें नई नहीं हैं। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 28 जनवरी 2020 को सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह अटल ने इस संबंध में प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को शिकायत दी थी। शिकायत में मंदिर से जुड़ी जमीन को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए थे। सवाल यह है कि यदि छह साल पहले मामला अधिकारियों के संज्ञान में आ चुका था तो अब तक निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? शिकायत की जांच किस अधिकारी ने की? जांच में क्या निष्कर्ष निकला? क्या किसी व्यक्ति से पूछताछ हुई? क्या राजस्व रिकॉर्ड की फोरेंसिक या विभागीय जांच कराई गई?


खजराना गणेश मंदिर इंदौर की धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है और उसकी संपत्तियों की सुरक्षा प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। ऐसे में अब यह मामला केवल भट्ट परिवार, प्रह्लाद या प्रकाश के नाम से जुड़े कथित सौदे तक सीमित नहीं रह सकता। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि सर्वे नंबर 491 का वास्तविक मालिक कौन है और जमीन का मालिकाना इतिहास क्या रहा है। यदि जमीन निजी थी तो उसके समर्थन में दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं और यदि मंदिर अथवा देवस्थान की संपत्ति को निजी बताकर किसी ने सौदे किए हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।


बौद्धिक प्रतिकार की विशेष पड़ताल में सामने आए दस्तावेजों के बाद अब सबसे बड़ी जरूरत पूरे रिकॉर्ड को जनता के सामने रखने की है। सर्वे नंबर 491, 579 और 1074 के मूल राजस्व रिकॉर्ड, पुराने और वर्तमान खसरे, नामांतरण आदेश तथा जमीन से जुड़े सभी विक्रय दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए। तभी यह साफ हो सकेगा कि आखिर खजराना गणेश मंदिर की जमीन के नाम पर उठे इन सवालों में सच क्या है और रिकॉर्ड में दर्ज नामों तथा बाद में सामने आए निजी मालिकाना दावों के बीच यह अंतर कैसे पैदा हुआ।


अब गेंद इंदौर प्रशासन के पाले में है। सवाल साफ है—रिकॉर्ड खोलिए और बताइए, खजराना की यह जमीन आखिर किसकी है?

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