दो कंपनियों पर फर्जी दस्तावेज और घटिया गुणवत्ता के आरोप में कार्रवाई, लेकिन उसी खरीद प्रक्रिया के जिम्मेदार अधिकारी को तीसरी बार सीजीएमटी की कुर्सी
भोपाल। मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग की खरीद व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एमपीपीएचएससीएल) में जिन टेंडरों से जुड़ी दो फर्मों पर फर्जी दस्तावेज और घटिया गुणवत्ता के आरोपों के चलते कार्रवाई हुई, उन्हीं प्रक्रियाओं के दौरान जिम्मेदारी संभाल रहे अधिकारी को फिर से चीफ जनरल मैनेजर टेक्निकल (सीजीएमटी) बना दिया गया है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर खरीद प्रक्रिया में गड़बड़ी इतनी गंभीर थी कि संबंधित फर्मों को ब्लैकलिस्ट करना पड़ा, तो उस प्रक्रिया की निगरानी करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई?
दो फर्मों के खिलाफ कार्रवाई से यह तो स्पष्ट होता है कि विभाग ने अनियमितताओं को गंभीर माना। लेकिन कार्रवाई का दायरा कंपनियों तक सीमित रह जाने से निगरानी तंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर टेंडर की तकनीकी जांच, दस्तावेजों का सत्यापन और गुणवत्ता परीक्षण किस स्तर पर हुआ था?
और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि संबंधित अधिकारी को तीसरी बार उसी महत्वपूर्ण तकनीकी पद की जिम्मेदारी मिल गई। यानी फर्मों पर कार्रवाई हुई, लेकिन अधिकारी की भूमिका पर कोई स्पष्ट सार्वजनिक जवाबदेही तय नहीं हुई।
यह मामला सिर्फ एक अधिकारी या दो फर्मों का नहीं है। स्वास्थ्य विभाग की खरीद में सरकारी धन और मरीजों के हित सीधे जुड़े हैं। यदि घटिया सामग्री या गलत दस्तावेजों के बावजूद खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ी, तो सवाल उठता है कि जिम्मेदारी तय करने का पैमाना आखिर क्या है?
बौद्धिक प्रतिकार के पांच सवाल
फर्म ब्लैकलिस्ट हुई तो अधिकारी पर कार्रवाई क्यों नहीं?
टेंडर की तकनीकी जांच किसने की थी?
फर्जी दस्तावेज पकड़ने में विभागीय तंत्र क्यों नाकाम रहा?
घटिया गुणवत्ता की जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी?
और सबसे बड़ा सवाल—तीसरी बार सीजीएमटी बनाने से पहले क्या पिछली खरीद प्रक्रियाओं की विभागीय जांच हुई थी?
फर्म पर गाज और अफसर को फिर ताज—यही विरोधाभास अब मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य खरीदी व्यवस्था की सबसे बड़ी कहानी बनता दिखाई दे रहा है।

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