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11 मौतें... 54 बीमार! मोहन सरकार से बड़ा सवाल—आखिर किसकी निगरानी में बिक रही थी मौत?

 

प्रणव बजाज

बंडा जहरीली शराब कांड ने आबकारी तंत्र की पोल खोली, मुख्यमंत्री के आदेश पर अधिकारी निलंबित—लेकिन क्या सिर्फ अफसरों पर कार्रवाई से लौटेगा भरोसा?



मध्य प्रदेश के सागर जिले के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब ने कम से कम 11 लोगों की जान ले ली, जबकि दर्जनों लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में मृतकों और बीमारों के आंकड़ों में अंतर भी सामने आ रहा है। यही सवाल सरकार की पारदर्शिता पर खड़ा होता है—जब मौतें इतनी तेजी से बढ़ रही थीं तो प्रशासन के पास वास्तविक आंकड़ा सार्वजनिक करने में एकरूपता क्यों नहीं है?


मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घटना के बाद सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। तीन आबकारी अधिकारियों को निलंबित किया गया, एक वरिष्ठ अधिकारी को मुख्यालय भेजा गया और पुलिस अधिकारियों पर भी कार्रवाई हुई। मुख्यमंत्री ने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।


लेकिन सवाल सिर्फ निलंबन का नहीं है।


मोहन यादव सरकार बताए—बंडा में अवैध शराब का नेटवर्क किसकी निगरानी में चल रहा था?


यदि जहरीली शराब प्रदेश की सीमा पार करके गांवों तक पहुंची, तो आबकारी और पुलिस की खुफिया व्यवस्था क्या कर रही थी? क्या स्थानीय स्तर पर पहले से शिकायतें थीं? क्या शराब की दुकानों और ठेकों की नियमित जांच हुई थी? और सबसे बड़ा सवाल—जिन अधिकारियों को आज निलंबित किया जा रहा है, उनके खिलाफ निगरानी तंत्र ने पहले कार्रवाई क्यों नहीं की?


रिपोर्टों के मुताबिक शुरुआती जांच में उत्तर प्रदेश के ललितपुर से शराब के तार जुड़ने की बात सामने आई है। कुछ रिपोर्टों में मेथनॉल की मौजूदगी की पुष्टि का भी उल्लेख है। ऐसे में जांच अब केवल शराब बेचने वालों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; सप्लाई चैन, परिवहन, स्थानीय संरक्षण और विभागीय मिलीभगत—हर कड़ी की जांच होनी चाहिए।


मोहन यादव से सीधे पांच सवाल


1. मृतकों का अंतिम और प्रमाणित आंकड़ा सरकार कब सार्वजनिक करेगी?


2. अवैध शराब गांवों तक पहुंचने से पहले आबकारी विभाग को इसकी भनक क्यों नहीं लगी?


3. केवल निलंबन होगा या जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक जवाबदेही भी तय होगी?


4. क्या इस पूरे नेटवर्क के राजनीतिक या प्रभावशाली संरक्षण की भी जांच होगी?


5. यदि जांच में प्रशासनिक लापरवाही या संरक्षण साबित होता है, तो क्या जिम्मेदारी सिर्फ छोटे अधिकारियों तक सीमित रहेगी?


मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग राजनीतिक रूप से की जा सकती है, लेकिन इस्तीफा स्वतः संवैधानिक अनिवार्यता नहीं है। असली कसौटी यह है कि क्या मुख्यमंत्री इस पूरे मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच सुनिश्चित करते हैं।


और एक गंभीर आरोप—“मुख्यमंत्री या उनके परिवार का शराब कारोबार है, इसलिए सरकार शराबबंदी नहीं करती”—इसे प्रमाण के बिना तथ्य बनाकर प्रकाशित करना उचित नहीं होगा। यदि ऐसा कोई दस्तावेजी प्रमाण है तो उसे सामने रखकर अलग खोजी रिपोर्ट बनाई जा सकती है।


फिलहाल जनता का सवाल साफ है—


“मोहन जी, अधिकारी निलंबित हो गए... लेकिन जिन 11 परिवारों के घरों में मातम है, उनकी मौत की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?”


बौद्धिक प्रतिकार की मांग: सिर्फ निलंबन नहीं—पूरे शराब नेटवर्क की जड़ तक जांच और हर दोषी पर कार्रवाई।

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