भोपाल। मध्यप्रदेश में जलवायु परिवर्तन का खतरा अब केवल कार्बन डाइऑक्साइड तक सीमित नहीं रह गया है। उपग्रह आधारित विश्लेषण में राज्य के कई हिस्सों में मीथेन उत्सर्जन के प्रमुख क्षेत्र सामने आने की बात कही जा रही है। चार प्रमुख क्षेत्रों की पहचान ने पर्यावरणीय निगरानी और सरकारी तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मीथेन को कम समय में तापमान बढ़ाने वाली शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसों में माना जाता है। इसके प्रमुख स्रोतों में पशुपालन, कचरा और अपशिष्ट, धान की खेती तथा तेल-गैस से जुड़ी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं। यही कारण है कि इसके उत्सर्जन की पहचान और स्रोत तक पहुंचना जलवायु नीति के लिए महत्वपूर्ण है।
एमपी के लिए चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि राज्य में बड़े शहरों के साथ विशाल कृषि क्षेत्र, पशुधन और कचरा प्रबंधन से जुड़े क्षेत्र मौजूद हैं। यदि चिन्हित इलाकों में मीथेन का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है तो इसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि स्थानीय तापमान, वायु गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि सरकार के पास इन उत्सर्जन क्षेत्रों की निगरानी और नियंत्रण के लिए क्या ठोस व्यवस्था है? क्या नगर निकायों के कचरा डंपिंग क्षेत्र, सीवेज संयंत्र और पशु अपशिष्ट से होने वाले उत्सर्जन की नियमित जांच हो रही है?
उपग्रह आंकड़े खतरे का संकेत दे सकते हैं, लेकिन असली चुनौती जमीन पर स्रोत की पहचान और नियंत्रण है।
जलवायु संकट धीरे-धीरे नहीं, कई बार अचानक महसूस होता है। मीथेन के मामले में सवाल सिर्फ यह नहीं कि गैस कहां से निकल रही है—सवाल यह भी है कि सरकार उसे रोकने के लिए कब जागेगी?

Post a Comment