नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक छोटे से वाक्य ने दिल्ली के सत्ता गलियारों में हलचल बढ़ा दी है—“अगली मंत्रिमंडल बैठक में नए साथी जुड़ेंगे।” इसके बाद दो सितंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक नहीं हुई तो अटकलों का बाजार और गर्म हो गया। अब छह-सात सितंबर की तारीख पर सबसे ज्यादा निगाहें टिक गई हैं।
चर्चा केवल नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल करने तक सीमित नहीं है। कई बड़े मंत्रालयों में जिम्मेदारियां बदलने की संभावना भी जताई जा रही है। जिन मंत्रियों के पास एक से अधिक महत्वपूर्ण विभाग हैं, उनसे कुछ जिम्मेदारियां लेकर नए चेहरों को दी जा सकती हैं।
शिक्षा मंत्रालय पर खास नजर
शिक्षा मंत्रालय इस संभावित बदलाव का सबसे संवेदनशील केंद्र बन गया है। जुलाई में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। अब चर्चा है कि इस विभाग को पूर्णकालिक रूप से किसी नए चेहरे को सौंपा जा सकता है।
इसके पीछे केवल प्रशासनिक कारण नहीं, बल्कि नई पीढ़ी और विद्यार्थियों के बीच सरकार की पकड़ मजबूत करने की रणनीति भी देखी जा रही है। बौद्धिक और अकादमिक पृष्ठभूमि वाले चेहरे को आगे लाने की चर्चा इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
70 पार नेताओं पर भी नजर
संभावित फेरबदल में उम्र भी एक महत्वपूर्ण कसौटी बन सकती है। मौजूदा मंत्रिपरिषद में 70 वर्ष से अधिक उम्र के कई नेता हैं। चर्चा है कि कुछ वरिष्ठ नेताओं की जिम्मेदारियां घटाकर उन्हें संगठन या राज्यों में महत्वपूर्ण भूमिका दी जा सकती है।
साथ ही एनडीए के सहयोगी दलों की हिस्सेदारी बढ़ाने का दबाव भी है। ऐसे में संभावित फेरबदल केवल मंत्रियों के चेहरे बदलने का मामला नहीं होगा, बल्कि मोदी सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं और 2029 की तैयारी का संकेत भी माना जाएगा।
फिलहाल अंतिम तस्वीर प्रधानमंत्री के फैसले के बाद ही साफ होगी, लेकिन दिल्ली का सन्नाटा बता रहा है कि पर्दे के पीछे हलचल जरूर तेज है।

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