वेयरहाउस से लेकर मंत्रालय तक जांच की जरूरत | प्रमुख सचिव अमित राठौर और आबकारी आयुक्त दीपक कुमार सक्सेना की भूमिका पर उठे सवाल
सागर। बंडा क्षेत्र में संदिग्ध जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद मध्यप्रदेश का आबकारी तंत्र सवालों के घेरे में है। सरकार ने मामले में निचले स्तर के आबकारी और पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की है, लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि अवैध शराब की रोकथाम और पूरे विभाग की निगरानी की प्रशासनिक जिम्मेदारी आखिर किस स्तर तक तय होगी?
मामले में वाणिज्यिक कर विभाग के प्रमुख सचिव अमित राठौर और आबकारी आयुक्त दीपक कुमार सक्सेना के स्तर तक जवाबदेही तय करने की मांग विपक्ष की ओर से की गई है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर दोनों अधिकारियों की भूमिका और प्रशासनिक जवाबदेही की जांच की मांग की है। यह फिलहाल राजनीतिक आरोप और जांच की मांग है, इसे दोष सिद्धि नहीं माना जा सकता।
कार्रवाई हुई, लेकिन निगरानी पर सवाल बरकरार
सरकार ने सागर शराबकांड के बाद आबकारी विभाग के अधिकारियों के खिलाफ निलंबन सहित कार्रवाई की है। इसके बावजूद सवाल यह है कि जिन अधिकारियों पर क्षेत्रीय निगरानी की जिम्मेदारी थी, उनके ऊपर भी निगरानी कौन कर रहा था?
आबकारी विभाग की व्यवस्था में शराब के उत्पादन, भंडारण, परिवहन और बिक्री की अलग-अलग कड़ियां हैं। इसलिए जांच का दायरा केवल उस व्यक्ति तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा जिसके पास से शराब बरामद हुई। शराब कहां बनी, किस माध्यम से आई, किस वेयरहाउस से निकली, किस परमिट पर परिवहन हुआ और बिक्री के लिए किस स्तर पर पहुंची—इन सभी कड़ियों का रिकॉर्ड जांचना जरूरी है।
‘सागर गोल्ड’ कार्रवाई ने भी खड़े किए सवाल
घटना के बाद सागर गोल्ड ब्रांड की शराब को लेकर आबकारी विभाग की कार्रवाई भी चर्चा में रही। रिपोर्टों के अनुसार पहले बिक्री रोकने, स्टॉक जब्त करने और नमूने जांच के लिए भेजने के निर्देश दिए गए, बाद में विभागीय स्तर पर इस कार्रवाई को लेकर स्थिति बदली।
यहीं सबसे महत्वपूर्ण सवाल उठता है—किस वैज्ञानिक रिपोर्ट या जांच के आधार पर शराब को संदिग्ध अथवा सुरक्षित माना गया?
यदि नमूने जांच के लिए भेजे गए थे तो उनकी रिपोर्ट क्या रही, और उस रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने क्या निर्णय लिया—इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करना जांच की पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण होगा।
वेयरहाउस व्यवस्था की भी हो जांच
अवैध शराब की आपूर्ति श्रृंखला में वेयरहाउस और परिवहन व्यवस्था महत्वपूर्ण कड़ी होती है। इसलिए प्रत्येक परमिट, स्टॉक रजिस्टर, वाहन नंबर, डिस्पैच रिकॉर्ड और संबंधित सीसीटीवी फुटेज की जांच से यह पता लगाया जा सकता है कि शराब की आवाजाही में कहीं नियमों का उल्लंघन तो नहीं हुआ।
इसी तरह यदि किसी वेयरहाउस में निगरानी व्यवस्था बंद मिली हो या रिकॉर्ड में विसंगति हो तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। हालांकि किसी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से दोषी ठहराने के लिए संबंधित मामले के आधिकारिक दस्तावेज और जांच निष्कर्ष जरूरी होंगे।
जिम्मेदारी की आखिरी सीमा कहां तक?
इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि प्रशासनिक जवाबदेही किस स्तर पर तय होगी।
अगर क्षेत्रीय अधिकारी की निगरानी में अवैध शराब का कारोबार चलता पाया जाता है तो उसके वरिष्ठ अधिकारियों की पर्यवेक्षण संबंधी जिम्मेदारी की भी जांच होनी चाहिए। लेकिन केवल पद पर होने के आधार पर किसी वरिष्ठ अधिकारी को मौतों का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। इसके लिए यह साबित करना होगा कि उन्हें मामले की जानकारी थी, उनके पास कार्रवाई की जिम्मेदारी थी और उन्होंने जानबूझकर या लापरवाही से उसे नहीं निभाया।
मुआवजे से आगे सिस्टम का ऑडिट जरूरी
जहरीली शराब से किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य चला जाता है तो उसका नुकसान केवल आर्थिक नहीं होता। इसलिए मुआवजे और गिरफ्तारियों के साथ-साथ यह भी सामने आना चाहिए कि त्रासदी रोकने में सिस्टम कहां विफल हुआ।
सागर की जांच का असली पैमाना यही होगा—क्या जांच शराब बनाने और बेचने वालों तक सीमित रहती है, या उत्पादन, वेयरहाउस, परमिट, परिवहन, स्थानीय निगरानी और शीर्ष प्रशासनिक पर्यवेक्षण तक पूरी श्रृंखला की जिम्मेदारी तय होती है?
दोष किसका है, इसका अंतिम फैसला जांच और अदालत करेंगी; लेकिन जवाबदेही किस-किस स्तर पर बनती है, इसकी जांच जरूर होनी चाहिए।

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