संपादकीय | प्रणव बजाज
मरीज अस्पताल में जिंदगी बचाने जाता है, लेकिन कई बार उसे इलाज से पहले बिल का सामना करना पड़ता है। महाराष्ट्र FDA के सर्वे में मेडिकल कंज्यूमेबल्स की खरीद कीमत और MRP के बीच असाधारण अंतर सामने आना इसी व्यवस्था पर गंभीर सवाल है। ₹11.05 के IV सेट पर ₹325 की MRP, ₹6.75 की सिरिंज पर ₹57.20 और ₹29.41 के कैथेटर पर ₹310 की MRP—ये आंकड़े केवल कीमतों का अंतर नहीं, बल्कि मरीज की मजबूरी और बाजार की पारदर्शिता का सवाल हैं।
अब समय केवल जांच या सलाह का नहीं, कड़े नियमन का है।
सरकार को प्रत्येक अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल की खरीद कीमत, MRP और मरीज से वसूली गई वास्तविक कीमत बिल पर अनिवार्य रूप से दर्ज करनी चाहिए। अस्पताल खरीद और मरीज बिलिंग का डेटा डिजिटल पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाए, ताकि नियामक एजेंसियां असामान्य मार्जिन की स्वतः पहचान कर सकें।
दूसरी बड़ी मांग है—मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर अधिकतम स्वीकार्य ट्रेड मार्जिन की सीमा तय हो। IV सेट, सिरिंज, कैथेटर, ग्लव्स और दूसरे जरूरी सामान के लिए अलग-अलग श्रेणी बनाकर उचित मूल्य सीमा निर्धारित की जाए। जिस उत्पाद की खरीद कीमत और मरीज से वसूली गई कीमत के बीच असामान्य अंतर मिले, वहां स्वतः ऑडिट हो।
तीसरा सवाल डॉक्टरों और अस्पतालों के संभावित आर्थिक हितों का है। हर डॉक्टर भ्रष्ट नहीं है, लेकिन जहां डॉक्टर की सलाह से किसी खास ब्रांड, जांच, इम्प्लांट या कंज्यूमेबल की बिक्री प्रभावित होती है, वहां हित-संघर्ष की अनिवार्य घोषणा क्यों न हो? डॉक्टर या अस्पताल को निर्माता, वितरक या डायग्नोस्टिक कंपनी से मिलने वाले किसी भी आर्थिक लाभ का खुलासा होना चाहिए।
चौथी मांग—मरीज को अनावश्यक कंज्यूमेबल या जांच से इनकार करने का अधिकार स्पष्ट रूप से बताया जाए। इमरजेंसी को छोड़कर महंगे विकल्प के साथ कम कीमत वाले चिकित्सकीय रूप से स्वीकार्य विकल्प उपलब्ध हों तो मरीज या परिजन को उनकी जानकारी दी जाए।
पांचवीं मांग—हर अस्पताल में स्वतंत्र बिलिंग ऑडिट हो। सरकारी और निजी दोनों अस्पतालों के लिए जोखिम आधारित जांच व्यवस्था बने और दोष साबित होने पर केवल जुर्माना नहीं, बल्कि अतिरिक्त वसूली की वापसी, लाइसेंस संबंधी कार्रवाई और गंभीर मामलों में आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान हो।
छठी और सबसे जरूरी मांग—राष्ट्रीय मेडिकल कंज्यूमेबल प्राइस रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाया जाए। दवाओं की तरह जरूरी मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स के लिए भी मूल्य निर्धारण, मार्जिन, MRP और बिलिंग के स्पष्ट नियम हों।
मरीज ICU में IV सेट का भाव पूछने की स्थिति में नहीं होता। यही उसकी सबसे बड़ी मजबूरी है। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था का पहला नियम होना चाहिए—मरीज की मजबूरी को बाजार की आजादी नहीं बनाया जा सकता।
सरकार यदि सचमुच मरीज को केंद्र में रखना चाहती है तो अब केवल गाइडलाइन और एडवाइजरी पर्याप्त नहीं। कीमत सार्वजनिक हो, मार्जिन सीमित हो, डॉक्टर-अस्पताल के आर्थिक हित पारदर्शी हों, बिलिंग ऑडिट अनिवार्य हो और मरीज से अतिरिक्त वसूली पर तत्काल कार्रवाई हो।
इलाज पर मुनाफा कमाना अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन इलाज की मजबूरी में कीमत छिपाकर या अस्पष्ट रखकर कमाया गया मुनाफा सार्वजनिक निगरानी के दायरे में जरूर होना चाहिए।
अब सवाल यह नहीं कि मेडिकल सामान कितना महंगा है। सवाल यह है कि मरीज को उसकी वास्तविक कीमत जानने का अधिकार आखिर कब मिलेगा?

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