“मुंबई लंदन से बेहतर है”, “गोरखपुर स्पेन से कम नहीं”—ऐसी तुलनाएं सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस में अक्सर सुनाई देती हैं। अपने शहर और देश पर गर्व करना अलग बात है, लेकिन बिना समान मानकों के अलग-अलग देशों और शहरों की तुलना करना वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने का माध्यम भी बन सकता है।
मुंबई की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और बुनियादी ढांचे की अपनी ताकत है, तो लंदन की भी अपनी अलग खूबियां और चुनौतियां हैं। इसी तरह गोरखपुर की तुलना पूरे स्पेन जैसे देश से करना भी अपने आप में ऐसा पैमाना खड़ा करता है, जिसमें आंकड़ों और परिस्थितियों की समानता जरूरी है। सवाल यह है कि तुलना किस आधार पर हो रही है—सड़क, सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार, सुरक्षा, शिक्षा या प्रति व्यक्ति आय?
यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों की संख्या और अनुभव बढ़ रहे हैं। दुबई, वियतनाम और श्रीलंका जैसे देशों की यात्रा के बाद भारतीय पर्यटक वहां की सार्वजनिक व्यवस्था, पर्यटन सुविधाओं और नागरिक सेवाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं। ऐसे अनुभवों के सामने केवल भावनात्मक तुलना लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकती।
देश की उपलब्धियों पर गर्व होना स्वाभाविक है, लेकिन मजबूत राष्ट्रवाद का आधार अपनी कमियों को छिपाना नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकार कर बेहतर बनाने की क्षमता भी है। असली सवाल यह होना चाहिए कि भारत को किसी दूसरे देश से बेहतर साबित करने की जरूरत क्यों पड़े—जब लक्ष्य अपने नागरिकों के लिए लगातार बेहतर व्यवस्था बनाना हो?

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