594 करोड़ के बंटवारे पर भाजपा के भीतर ही बगावत, किसी वार्ड पर करोड़ों की बारिश तो कई के हिस्से शून्य—अखिलेश ने योगी सरकार पर कसा तंज
कानपुर। कानपुर नगर निगम में विकास के नाम पर प्रस्तावित धनराशि ने विकास से ज्यादा बंटवारे की राजनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नगर निगम के 110 पार्षदों के वार्डों में पिछले साढ़े तीन साल के दौरान करीब 594 करोड़ रुपये के 765 विकास कार्य प्रस्तावित किए जाने की जानकारी सामने आई है। लेकिन वार्डवार आंकड़ों में अंतर इतना बड़ा है कि अब सवाल सड़क, नाली और विकास से आगे निकलकर निधि बांटने के पैमाने और प्रक्रिया पर टिक गया है।
मामला इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि सवाल विपक्ष ने नहीं, बल्कि भाजपा के ही बागी पार्षदों ने उठाए हैं। उनके मुताबिक कुछ वार्डों में करोड़ों रुपये के काम प्रस्तावित किए गए, जबकि कई वार्डों को एक रुपया तक नहीं मिला। आंकड़ों में वार्ड-62 के लिए करीब 14.41 करोड़ रुपये प्रस्तावित बताए गए हैं। दूसरी ओर वार्ड-94, 38, 4 और 10 के लिए राशि शून्य बताई गई है।
यही असमानता अब राजनीतिक हथियार बन गई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमला बोलते हुए तंज किया—“नामबदलू मुख्यमंत्री जी, कानपुर का नाम कमीशनपुर कर दीजिए।”
लेकिन असली सवाल तंज से भी बड़ा है—क्या सार्वजनिक धन का वितरण जरूरत के आधार पर हुआ या राजनीतिक प्रभाव के आधार पर? यदि सभी वार्डों की जरूरतें अलग थीं तो उसका स्पष्ट सार्वजनिक आधार क्या था? और यदि प्रक्रिया पारदर्शी थी तो भाजपा के पार्षदों को ही सवाल उठाने की जरूरत क्यों पड़ी?
करीब 125 करोड़ रुपये के विकास कार्यों के टेंडर रद्द कर दोबारा कराने की तैयारी की खबर ने विवाद को और गंभीर बना दिया है।
कानपुर को विकास चाहिए, वितरण में भेदभाव नहीं। जनता के पैसे का हिसाब चाहिए—किसे कितना मिला, क्यों मिला और किस आधार पर मिला। वरना ‘कमीशनपुर’ का राजनीतिक तंज केवल बयान नहीं रहेगा, बल्कि नगर निगम की कार्यप्रणाली पर स्थायी सवाल बन जाएगा।

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