फैटी लिवर यानी मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) होने पर कई लोग दूध को लेकर भ्रम में रहते हैं। सामान्य तौर पर फैटी लिवर के मरीज को दूध पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं होती। असली ध्यान दूध में मौजूद अतिरिक्त कैलोरी और सैचुरेटेड फैट पर होना चाहिए।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि मरीज दूध पीता है तो लो-फैट या स्किम्ड दूध बेहतर विकल्प हो सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें वजन अधिक है, डायबिटीज या कोलेस्ट्रॉल की समस्या भी है। फैटी लिवर के प्रबंधन में कुल कैलोरी और सैचुरेटेड फैट कम करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसके उलट दूध में चीनी मिलाकर पीना, फ्लेवर्ड मिल्क, मिल्कशेक या अत्यधिक कैलोरी वाले डेयरी उत्पाद नियमित रूप से लेना सही विकल्प नहीं है। खासकर मीठे पेय और ज्यादा शुगर वाले खाद्य पदार्थों को सीमित करने की सलाह दी जाती है।
फैटी लिवर में सबसे बड़ा लक्ष्य सिर्फ किसी एक खाद्य पदार्थ को छोड़ना नहीं, बल्कि पूरे खानपान और वजन पर नियंत्रण है। AASLD के अनुसार वजन में लगभग 5–10% तक कमी लिवर में फैट और बीमारी से जुड़े मेटाबॉलिक जोखिमों में सुधार से जुड़ी है। नियमित शारीरिक गतिविधि और संतुलित आहार भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
सीधी बात: फैटी लिवर है तो दूध से डरने की जरूरत नहीं, लेकिन फुल-फैट और मीठे डेयरी उत्पादों की जगह कम वसा वाला दूध और नियंत्रित मात्रा बेहतर विकल्प हो सकता है। व्यक्ति की डायबिटीज, वजन, कोलेस्ट्रॉल और लिवर की स्थिति के अनुसार डॉक्टर या डाइटीशियन से व्यक्तिगत डाइट प्लान लेना सबसे सुरक्षित है।

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