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सरकारें बदलीं, नशा नहीं! पंजाब में दो दशक से चल रहा ‘नशे के खिलाफ युद्ध’ आखिर जीता कौन?

 

अकाली-भाजपा से कांग्रेस और फिर आप तक—गिरफ्तारियां बढ़ीं, बरामदगी बढ़ी, बड़े नेटवर्क सामने आए; लेकिन सवाल वही: पंजाब का युवा नशे से बाहर क्यों नहीं आया?


चंडीगढ़। पंजाब की राजनीति में नशा कोई नया मुद्दा नहीं है। करीब दो दशक से हर चुनाव में यह सबसे बड़े सवालों में शामिल रहा है। 2007 में अकाली-भाजपा सरकार, 2017 में कांग्रेस और 2022 में आम आदमी पार्टी सत्ता में आई। सरकारें बदलती रहीं, अभियान बदलते रहे, पुलिस कार्रवाई का पैमाना बढ़ता गया—लेकिन नशे का संकट खत्म नहीं हुआ।



उपलब्ध सरकारी, पुलिस, एनसीआरबी, एनसीबी और केंद्रीय जांच एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि कार्रवाई लगातार बढ़ी है। हालांकि एक जरूरी सावधानी भी है—ज्यादा मामले और गिरफ्तारियां अपने आप में नशे की खपत बढ़ने या घटने का प्रमाण नहीं हैं। यह पुलिस की सक्रियता और प्राथमिकी दर्ज होने की संख्या का परिणाम भी हो सकता है। असली कसौटी यह है कि क्या सप्लाई की मुख्य कड़ियां, वित्तीय नेटवर्क और सीमा-पार तंत्र कमजोर हुआ?


अकाली-भाजपा शासन के दौरान 2007 से 2011 के बीच एनडीपीएस मामलों में 30,422 गिरफ्तारियां हुईं। 2012 से 2015 के बीच यह संख्या बढ़कर 58,511 हो गई। इसी दौर में पूर्व डीएसपी और अर्जुन पुरस्कार विजेता पहलवान जगदीश भोला की गिरफ्तारी ने पंजाब के ड्रग नेटवर्क को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। जांच में हजारों करोड़ रुपये के नेटवर्क की बात सामने आई और बाद में कई प्रभावशाली लोगों के नाम जांच के घेरे में आए।


2017 में सत्ता में आई कांग्रेस सरकार ने स्पेशल टास्क फोर्स बनाई। 2017 से 2021 के बीच उपलब्ध आंकड़ों में 52,255 एनडीपीएस मामले और 68,064 गिरफ्तारियां दर्ज हुईं। इसी दौर में राजनीतिक रूप से चर्चित मामलों ने यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या ड्रग कारोबार की जांच केवल तस्करों तक सीमित रहेगी या राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण की संभावित कड़ियां भी जांच के दायरे में आएंगी।


2022 में भगवंत मान के नेतृत्व में आप सरकार आई और ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ अभियान शुरू किया। सरकार के अनुसार 2022 से 2026 के बीच 73,541 एनडीपीएस मामले दर्ज हुए और 98,596 गिरफ्तारियां हुईं। करीब 5,979 किलो हेरोइन, 93 किलो आईसीई, 3,583 किलो अफीम और बड़ी मात्रा में फार्मा गोलियां-कैप्सूल जब्त किए जाने का दावा है। सरकार ने संपत्ति जब्ती, ड्रग मनी की बरामदगी और करीब 89 प्रतिशत दोषसिद्धि दर का भी उल्लेख किया है।


लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर कार्रवाई का पैमाना इतना बड़ा है, तो नशे की सप्लाई लाइन अब भी क्यों दिखाई देती है?


पंजाब में ऐसे मामले भी सामने आए जिनमें पुलिसकर्मी, राजनीतिक कार्यकर्ता और प्रभावशाली लोगों तक जांच पहुंची। जगदीश भोला नेटवर्क से लेकर पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर इंदरजीत सिंह, पूर्व एसएसपी राजजीत सिंह हुंदल और अन्य चर्चित मामलों ने यह संकेत दिया कि समस्या केवल सड़क पर नशा बेचने वाले छोटे तस्कर तक सीमित नहीं है।


कभी 6,000 करोड़ रुपये के नेटवर्क की चर्चा हुई, कभी सीमा-पार तस्करी सामने आई और कभी ड्रग मनी तथा संपत्तियों की जांच हुई। लेकिन दो दशक बाद भी सबसे महत्वपूर्ण सवाल का जवाब अधूरा है—नशे की मांग और सप्लाई दोनों को स्थायी रूप से कैसे तोड़ा जाए?


पुलिस की कार्रवाई जरूरी है, लेकिन अकेली पुलिस नशा खत्म नहीं कर सकती। पुनर्वास, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, रोजगार, परिवारों की भागीदारी, स्कूल-कॉलेज स्तर पर रोकथाम और सीमा-पार तस्करी पर कठोर कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है।


पंजाब को अब गिरफ्तारियों की गिनती नहीं, नशे से बाहर आए युवाओं की गिनती चाहिए।


क्योंकि चुनाव दर चुनाव नारा बदल सकता है, सरकार बदल सकती है, जांच एजेंसी बदल सकती है—लेकिन अगर पंजाब का युवा नहीं बदला, तो नशे के खिलाफ यह ‘युद्ध’ सिर्फ आंकड़ों की लड़ाई बनकर रह जाएगा।

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