नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ठेका कर्मचारियों की ग्रेच्युटी से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि कर्मचारियों और Principal Employer के बीच नियोक्ता-कर्मचारी संबंध नहीं है, तो केवल इस आधार पर Principal Employer को ग्रेच्युटी का भुगतान करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही, Payment of Gratuity Act के तहत काम करने वाली Controlling Authority यह तय नहीं कर सकती कि ग्रेच्युटी की कानूनी देनदारी आखिर किस पक्ष की है।
मामला ONGC और Suryakand D. Lad व अन्य से जुड़ा है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने Bombay High Court के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ONGC को ठेके के माध्यम से लगाए गए कर्मचारियों की ग्रेच्युटी के भुगतान के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने Appellate Authority के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें ONGC के पक्ष में फैसला दिया गया था।
अदालत ने कहा कि Controlling Authority की भूमिका कानून के तहत मुख्यतः पात्र कर्मचारी को देय ग्रेच्युटी की राशि निर्धारित करने तक सीमित है। वह इस अधिकार क्षेत्र में जाकर यह तय नहीं कर सकती कि भुगतान की मूल कानूनी जिम्मेदारी Principal Employer की है या Contractor की।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि ONGC कर्मचारियों को ग्रेच्युटी की राशि पहले ही दे चुका था। इसलिए कर्मचारियों से उस रकम की वसूली नहीं की जाएगी। मामले का नाम M/s Oil and Natural Gas Corporation Ltd. v. Suryakand D. Lad & Ors., 2026 LiveLaw (SC) 961 है।

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