प्रणव बजाज
मरीज डॉक्टर पर भरोसा कर पर्ची लेता है, लेकिन अगर उसी पर्ची के पीछे दवा कंपनी का टारगेट और अस्पताल का मुनाफा खड़ा हो तो सवाल इलाज की नीयत पर नहीं, पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर उठता है। भोपाल के कुछ निजी अस्पतालों और दवा कंपनियों के बीच कथित गठजोड़ को लेकर गंभीर दावे सामने आए हैं।
आरोप है कि मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव डॉक्टरों और अस्पताल प्रबंधन के साथ दवाओं की बिक्री के मासिक लक्ष्य तय करते हैं। लक्ष्य पूरा होने पर महंगे गिफ्ट, फाइव स्टार सेमिनार, पार्टियां और विदेशी यात्राओं तक के प्रलोभन दिए जाने की बात कही गई है। दुबई, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे टूर का दावा भी सामने आया है।
सबसे सनसनीखेज दावा 30 से 40 प्रतिशत तक मार्जिन का है। एक एमआर के हवाले से कहा गया है कि कुछ बड़े निजी अस्पतालों में आईवी फ्लूड, एंटीबायोटिक और इंजेक्शन निर्धारित कंपनियों से खरीदने के बदले अस्पताल को इतना मार्जिन मिलने की बात है। छोटे क्लीनिकों के लिए 20 से 50 हजार रुपए प्रतिमाह तक के फिक्स इंसेंटिव का दावा भी किया गया है।
पर्ची से मेडिकल स्टोर तक कथित नेटवर्क
आरोप है कि कुछ अस्पतालों में डॉक्टर वही ब्रांड लिखते हैं जो परिसर के मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध होता है। एक ही साल्ट की दवा 50 रुपए के आसपास और ब्रांडेड दवा 250-300 रुपए तक बिकने का दावा है। सवाल है—इस कीमत के अंतर का फायदा किसे मिलता है?
सबसे बड़ा बोझ आखिरकार मरीज पर पड़ता है। इसलिए इन आरोपों की स्वतंत्र जांच, बिलों की पड़ताल और भुगतान रिकॉर्ड की जांच जरूरी है। संबंधित अस्पतालों, डॉक्टरों और कंपनियों का पक्ष भी सामने आना चाहिए।

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