संघ परिवार के डेढ़ लाख से ज्यादा सेवा प्रकल्प, 2027 के लिए यूपी में फिर जमीन तैयार करने की कवायद
प्रणव बजाज
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों के देशभर में चल रहे सेवा प्रकल्प अब केवल सामाजिक सेवा तक सीमित दिखाई नहीं दे रहे। डेढ़ लाख से अधिक सेवा गतिविधियों के जरिए समाज के वंचित तबकों तक पहुंच बनाने का अभियान राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर रहा है। खास निशाने पर ओबीसी, दलित और आदिवासी समाज है। सवाल इसलिए बड़ा है कि सेवा के जरिए तैयार हो रहा सामाजिक संपर्क क्या भाजपा के लिए चुनावी पूंजी में बदल रहा है?
देश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 131 लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा पिछले तीन चुनावों में मजबूत प्रदर्शन करती रही है। हिंदी पट्टी और पश्चिमी भारत में दलित-आदिवासी समाज के बीच भाजपा की पैठ इसी सामाजिक पुनर्संयोजन का परिणाम मानी जाती है।
लेकिन 2024 ने भाजपा को साफ चेतावनी दी। संविधान और आरक्षण को लेकर विपक्ष के प्रचार ने दलित मतदाताओं के एक हिस्से में आशंका पैदा की और भाजपा का पुराना समीकरण कमजोर हुआ। अब संघ परिवार ने उत्तर प्रदेश में सामाजिक समरसता और सेवा गतिविधियों को तेज करने की रणनीति पर जोर दिया है।
यूपी में असली परीक्षा गैर-जाटव दलितों की
उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 21 प्रतिशत है और 80 लोकसभा सीटों में 17 सीटें आरक्षित हैं। जाटव मतदाता लंबे समय से बसपा के मजबूत आधार रहे हैं, जबकि पासी, कोरी, वाल्मीकि, धोबी, खटीक जैसे गैर-जाटव समूहों में भाजपा ने पिछले वर्षों में प्रभाव बढ़ाया।
2014 और 2019 में लाभार्थी योजनाओं, हिंदुत्व और सामाजिक संपर्क के गठजोड़ ने भाजपा को फायदा दिया। लेकिन 2024 में संविधान और आरक्षण का मुद्दा इस समीकरण पर भारी पड़ा।
अब संघ के सामने चुनौती सिर्फ सेवा करने की नहीं, टूटे सामाजिक भरोसे को फिर जोड़ने की है।
2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव इसलिए सिर्फ सत्ता का चुनाव नहीं होगा। यह भी तय करेगा कि दलित समाज भाजपा के साथ फिर खड़ा होता है या संविधान, आरक्षण और सामाजिक न्याय के सवालों पर विपक्ष की नई गोलबंदी मजबूत होती है।
सेवा प्रकल्पों की जमीन पर चुनावी रणनीति कितनी सफल होती है, इसका सबसे बड़ा फैसला यूपी करेगा।

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