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पंजाब में हवारा की पैरोल पर सियासी यू-टर्न, AAP के निशाने पर पंथिक वोट?

चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले जगतार सिंह हवारा की पैरोल का मुद्दा एक बार फिर राज्य की सियासत के केंद्र में आ गया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने हवारा को अपनी बीमार मां से मिलने के लिए 10 दिन की पैरोल देने की सिफारिश राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से की है। खास बात यह है कि मार्च में पंजाब सरकार ने हवारा की पैरोल याचिका के खिलाफ रुख अपनाया था। कुछ महीनों के भीतर बदले इस रुख ने राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। 



हवारा पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है। ऐसे में उसकी पैरोल केवल मानवीय आधार का मामला नहीं रह गई, बल्कि पंजाब की पंथिक राजनीति से जुड़ गई है। सिख संगठनों और बंदी सिखों की रिहाई के समर्थक लंबे समय से हवारा को पैरोल देने की मांग उठाते रहे हैं। 


AAP के बदले रुख को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं है। पंजाब में पंथिक मतदाताओं के बीच अपनी जगह मजबूत करने के लिए आम आदमी पार्टी के सामने शिरोमणि अकाली दल और वारिस पंजाब दे जैसी ताकतों की चुनौती है। ऐसे में हवारा की पैरोल का समर्थन AAP के लिए राजनीतिक संदेश देने का माध्यम बन सकता है। 


लेकिन सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल भी यही है—अगर मामला पूरी तरह मानवीय है तो मार्च में विरोध और अगस्त में समर्थन क्यों? क्या सरकार ने अपना प्रशासनिक रुख बदला है या चुनावी समीकरणों ने नीति बदल दी?


पैरोल मिलेगी या नहीं, यह अलग विषय है। लेकिन इतना साफ है कि पंजाब में बंदी सिखों और पंथिक राजनीति की पुरानी आग फिर सुलग रही है और 2027 के चुनाव में इसका असर दिखाई दे सकता है।

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