31 अगस्त 2026 को हेग स्थित सिंधु जल विवाद की पंच सदस्यीय मध्यस्थता पीठ ने भारत की ओर से संधि को “अभयावस्था” में रखने के फैसले को स्वीकार नहीं किया और कहा कि संधि प्रभावी बनी हुई है। साथ ही रतले जलविद्युत परियोजना के कुछ निर्माण कार्यों पर अंतरिम रोक लगाने का आदेश भी दिया। भारत ने इस फैसले को सिरे से खारिज करते हुए पीठ को ही अधिकारहीन और अवैध रूप से गठित बताया।
पीठ में अमेरिका के सीन डी. मर्फी, बेल्जियम के वाउटर ब्यूटार्ट, अमेरिका के जेफरी पी. माइनियर, जॉर्डन के अवन शौकत अल-खसावनेह और ऑस्ट्रेलिया के डोनाल्ड ब्लैकमोर शामिल हैं।
पहला अहम नाम—डोनाल्ड ब्लैकमोर। 2011 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें जल क्षेत्र से जुड़े सलाहकार के रूप में नियुक्त किया था। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन के अनुसार, ब्लैकमोर को पाकिस्तान की जल परियोजनाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर समर्थन जुटाने के उद्देश्य से बनाए गए जल क्षेत्र कार्यबल में सलाहकार बनाया गया था। उनके पास सिंधु समेत दुनिया की कई प्रमुख नदी प्रणालियों पर काम करने का अनुभव था।
दूसरा नाम—अवन शौकत अल-खसावनेह। वह जॉर्डन के पूर्व न्यायाधीश हैं और इस मामले में उन्हें पाकिस्तान ने अपने दो मध्यस्थों में से एक के तौर पर नियुक्त किया था। मूल प्रक्रिया में पाकिस्तान ने 2016 में डोनाल्ड ब्लैकमोर और जज ब्रूनो सिम्मा को नियुक्त किया था। बाद में सिम्मा के उपलब्ध न होने पर अक्टूबर 2022 में पाकिस्तान ने उनकी जगह अल-खसावनेह को नियुक्त किया।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भारत ने इस पूरी मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग ही नहीं लिया और अपने हिस्से के मध्यस्थ नियुक्त नहीं किए, तब पाकिस्तान द्वारा नियुक्त दोनों सदस्य पीठ का हिस्सा कैसे बने? PCA के दस्तावेज बताते हैं कि भारत ने नियुक्ति प्रक्रिया में भाग नहीं लिया था।
हालांकि, इसे सीधे “दो जज पाकिस्तान के प्रभाव में थे” कहना उपलब्ध तथ्यों से साबित नहीं होता। असली विवाद पीठ की वैधता, नियुक्ति प्रक्रिया और भारत की गैर-भागीदारी को लेकर है। यही वह बिंदु है जिस पर भारत सरकार ने पूरे निर्णय को चुनौती दी है।
सबसे तीखा सवाल: जिस विवाद में भारत पक्षकार है, भारत ने मध्यस्थता को स्वीकार ही नहीं किया, फिर पाकिस्तान की ओर से नियुक्त दो सदस्य पांच सदस्यीय पीठ में निर्णायक भूमिका तक कैसे पहुंचे? यही इस पूरे फैसले की सबसे विवादास्पद कड़ी है।

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