पटना। जमुई मामले में तीन आरोपियों के नाबालिग होने की जानकारी ने बिहार में किशोर अपराध को लेकर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, उपलब्ध राष्ट्रीय आंकड़ों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि बिहार देश में नाबालिगों के अपराध में सबसे आगे है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों में 2021 में बिहार में कानून के साथ संघर्ष में आए किशोरों से जुड़े 732 मामले दर्ज हुए थे, जबकि मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह संख्या इससे काफी अधिक थी।
फिर भी बिहार में बच्चों के अपराध में शामिल होने के पीछे कई सामाजिक और पारिवारिक कारणों पर चर्चा होती रही है। परिवार में निगरानी और संवाद की कमी, स्कूल से दूरी, आर्थिक दबाव, गलत संगत और अपराधी समूहों का प्रभाव किशोरों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा सोशल मीडिया और इंटरनेट पर हिंसक या आपराधिक सामग्री तक आसान पहुंच भी चिंता का विषय है। सरकारी साइबर-सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र भी अभिभावकों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने और उनसे इंटरनेट के संभावित खतरों को लेकर बातचीत करने की सलाह देता है।
राष्ट्रीय स्तर पर 2022 में किशोरों से जुड़े 30,555 मामले दर्ज हुए और 37,780 किशोर पकड़े गए। इनमें 16 से 18 वर्ष की उम्र वाले किशोरों की हिस्सेदारी 78.6 प्रतिशत थी। चोरी, मारपीट, सेंधमारी और हत्या के प्रयास जैसे मामलों में भी किशोरों की संलिप्तता दर्ज हुई।
इसलिए जमुई की घटना को केवल कानून-व्यवस्था का मामला मानने के साथ-साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि **परिवार, स्कूल, समाज और बाल संरक्षण व्यवस्था मिलकर किशोरों को अपराध से दूर रखने के लिए कितना प्रभावी काम कर रही है।**

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