सागर। मध्य प्रदेश के सागर जिले के देवरी में मक्का खरीदी से जुड़ा ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी खरीद व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दस्तावेजों में 378 टन यानी 3,430 क्विंटल मक्का एक वेयरहाउस में रखा बताया गया, लेकिन जब भौतिक सत्यापन हुआ तो मौके पर न वेयरहाउस मिला और न मक्का। इस मामले में भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ के अधिकारियों की शिकायत पर पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी और गबन सहित धाराओं में मामला दर्ज किया है।
27 किसानों के नाम पर खरीदी
मामला देवरी की फूड गार्ड फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी ने भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ के पोर्टल पर 27 किसानों से मक्का खरीदी दर्शाई। इनमें 17 किसानों के नाम पर 3,430 क्विंटल मक्का की राशि करीब 76.31 लाख रुपये सीधे खातों में पहुंची। वहीं 10 किसानों के नाम पर करीब 34.84 लाख रुपये का भुगतान सत्यापन न होने के कारण रोक दिया गया।
जुलाई 2025 में खुली पोल
जुलाई 2025 में अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर स्टॉक का भौतिक सत्यापन किया। दस्तावेजों में शांडिल्य वेयरहाउस में मक्का रखा था, लेकिन जांच में यह वेयरहाउस मौके पर मिला ही नहीं। मध्यप्रदेश वेयरहाउसिंग एवं लॉजिस्टिक्स कॉरपोरेशन के रिकॉर्ड में भी इस नाम के वेयरहाउस का पंजीयन नहीं मिला।
जांच में यह भी आरोप सामने आया कि कंपनी के निदेशक मनीष पटेल ने अपने मकान को ही वेयरहाउस बताकर किरायानामा तैयार किया। दूसरे कथित शांडिल्य वेयरहाउस के किरायानामे में 81 वर्षीय जगदीश प्रसाद के कथित फर्जी हस्ताक्षर और सील इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई। पुलिस के अनुसार जिस स्टाम्प पर किरायानामा तैयार किया गया, वह उसकी तारीख के बाद खरीदा गया था।
सर्वेयर भी कागजों में?
मामला यहीं नहीं रुकता। पोर्टल पर एनसीसीएफ इंदौर की सील-साइन और एजीनेक्स्ट कंपनी की सर्वेयर रिपोर्ट अपलोड की गई। जांच में बताया गया कि देवरी केंद्र पर एजीनेक्स्ट का कोई सर्वेयर नियुक्त ही नहीं था। यानी जिस व्यवस्था का काम स्टॉक और गोदाम की वास्तविकता की पुष्टि करना था, उसकी रिपोर्ट पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
चार आरोपी, जांच का दायरा बढ़ सकता है
एफआईआर में मनीष पटेल, अतिशय जैन, युक्ति कंपनी हैदराबाद और उसके जोनल मैनेजर राहुल कुमार ओझा को आरोपी बनाया गया है। पुलिस का कहना है कि जांच जारी है और इसमें अन्य लोगों की भूमिका भी सामने आ सकती है।
सबसे बड़ा सवाल: 378 टन मक्का कागजों पर खरीदा गया, उसके भंडारण का प्रमाणन हुआ और लाखों रुपये का भुगतान भी हो गया—तो फिर गोदाम की भौतिक मौजूदगी और वास्तविक स्टॉक की जांच किस स्तर पर हुई? यह मामला केवल मक्का खरीदी का नहीं, बल्कि पूरी सत्यापन व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा है।

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