अमेरिका के 30 साल के Treasury Bond की यील्ड 5.48% तक पहुंच गई है। यह 2004 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। साथ ही 10 साल की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड भी करीब 5.20% तक पहुंची। बॉन्ड यील्ड में इस तेज उछाल ने दुनिया भर के शेयर बाजारों में चिंता बढ़ा दी है।
भारत पर इसका असर सीधे विदेशी निवेश के रास्ते आता है। अमेरिकी बॉन्ड पर ज्यादा रिटर्न मिलने से वैश्विक निवेशकों के सामने सुरक्षित अमेरिकी कर्ज और जोखिम वाली भारतीय इक्विटी के बीच रिटर्न का अंतर बदल जाता है। इससे भारतीय शेयरों से विदेशी पूंजी निकलने का दबाव बढ़ सकता है। साथ ही डॉलर मजबूत होने पर रुपये पर भी दबाव आता है।
मुश्किल यह है कि बॉन्ड यील्ड के साथ कच्चा तेल भी $102 प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया है। महंगा तेल भारत के आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ा सकता है। इसी बीच अमेरिकी फेड की ब्याज दरों को लेकर भी बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।
24 सितंबर को इसका असर दलाल स्ट्रीट पर साफ दिखाई दिया। Nifty 50 में 383.70 अंकों यानी 1.64% की गिरावट आई, जबकि Sensex 1,247.71 अंक यानी 1.67% टूट गया।
अब बाजार की दिशा तय करने में अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चा तेल और रुपया तीन बड़े संकेतक होंगे। यील्ड और तेल ऊंचे बने रहे तो अस्थिरता जारी रह सकती है; लेकिन इनमें राहत मिलने पर बाजार पर दबाव कम हो सकता है। फिलहाल “बाजार यहीं से और गिरेगा” कहना जल्दबाजी होगी—आने वाले आंकड़े और वैश्विक घटनाक्रम दिशा तय करेंगे।

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