नई दिल्ली। दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत के ढहने से सात लोगों की मौत के बाद दिल्ली नगर निगम की भवन सुरक्षा व्यवस्था कठघरे में है। सबसे बड़ा सवाल उस सर्वे पर है, जिसमें वर्ष 2026 की शुरुआत में 27,84,286 इमारतों का निरीक्षण किया गया, लेकिन इनमें सिर्फ 19 इमारतों को खतरनाक बताया गया था।
आंकड़ा सामने आते ही सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या राजधानी की करीब 28 लाख इमारतों में वास्तव में केवल 19 ही ऐसी थीं जिनसे लोगों की जान को खतरा था? अगर सर्वे इतना व्यापक था, तो सत्य निकेतन की वह इमारत निगरानी के दायरे से कैसे निकल गई, जो बाद में देखते ही देखते मलबे में बदल गई?
हादसे के बाद आसपास की कुछ इमारतों की दोबारा जांच की गई और चार इमारतों को जर्जर व खतरनाक स्थिति में पाए जाने पर नोटिस दिए गए। वहीं एमसीडी ने अवैध रूप से बने चार से अधिक मंजिल वाले भवनों पर कार्रवाई और सीलिंग अभियान की बात कही है।
मामले में पांच एमसीडी अधिकारियों के निलंबन और उच्चस्तरीय जांच के बाद सवाल और गंभीर हो गया है—अगर जिम्मेदारी सिर्फ हादसे के बाद तय होगी, तो हादसा रोकने वाली निगरानी व्यवस्था किसलिए थी?
सत्य निकेतन ने दिल्ली की भवन सुरक्षा व्यवस्था की एक ऐसी खिड़की खोल दी है, जिसके पीछे अब सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि सर्वे, निरीक्षण, अवैध निर्माण और अधिकारियों की जवाबदेही—पूरी व्यवस्था का हिसाब मांगने की जरूरत है।

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