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जिस तारीख को रिश्वत लेते पकड़े गए, 24 साल बाद उसी तारीख को मिली सजा

 

इंदौर। भ्रष्टाचार के एक पुराने मामले में अदालत का फैसला अपने आप में संयोग बन गया। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के तत्कालीन कार्यपालन यंत्री कैलाशचंद्र परवाल को 6 सितंबर 2002 को 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़ा गया था। ठीक 24 साल बाद, 6 सितंबर 2026 को उन्हें मामले में सजा सुनाई गई।



दो दशक से ज्यादा पुराने इस मामले ने भ्रष्टाचार के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार पर भी सवाल खड़े किए हैं। जिस अधिकारी को कथित तौर पर रिश्वत लेते पकड़ा गया था, उस मामले को अंतिम फैसले तक पहुंचने में करीब ढाई दशक लग गए।


ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ आरोपी को मिली सजा का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें भ्रष्टाचार के मामले वर्षों तक अदालतों में चलते रहते हैं। इस दौरान संबंधित अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाता है, लेकिन मुकदमा अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है।


यह मामला यह सवाल भी खड़ा करता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया को समयबद्ध करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की जाती? यदि रिश्वत लेते अधिकारी को मौके पर ही पकड़ा गया था तो अंतिम निर्णय में 24 वर्ष क्यों लगे?


भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई तभी प्रभावी मानी जाएगी जब गिरफ्तारी के साथ-साथ मुकदमे का फैसला भी समय पर हो।


6 सितंबर 2002 की गिरफ्तारी और 6 सितंबर 2026 की सजा—दो तारीखों के बीच 24 साल का फासला, भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यवस्था की रफ्तार पर बड़ा सवाल छोड़ गया।

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