अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सप्लाई बाधित होने की आशंका ने ब्रेंट क्रूड को तेज उछाल दिया है। 9 सितंबर को ब्रेंट करीब 101 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा।
इस तेजी का असर सीधे भारत की सरकारी तेल कंपनियों इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के मार्जिन पर पड़ रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक मौजूदा कच्चे तेल की कीमतों और घरेलू पंप कीमतों के बीच अंतर इतना बढ़ गया है कि कंपनियों को पेट्रोल की बिक्री पर करीब 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 23 रुपये प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी हो रही है। एक अन्य आकलन में पेट्रोल पर यह दबाव करीब 4.2 रुपये और डीजल पर 24.9 रुपये प्रति लीटर बताया गया है।
सवाल यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल लगातार महंगा हो रहा है तो देश में पेट्रोल-डीजल के दाम उसी अनुपात में क्यों नहीं बढ़ रहे? फिलहाल खुदरा कीमतों को स्थिर रखने का दबाव कंपनियों के मार्जिन पर पड़ रहा है। इसका असर लंबे समय तक जारी रहा तो तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति और सरकार पर राहत देने का दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।
भारत के लिए चिंता सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। कच्चा तेल महंगा होने का मतलब है आयात बिल बढ़ना, रुपये पर दबाव और परिवहन लागत में बढ़ोतरी। इसका असर आगे चलकर माल ढुलाई से लेकर खाद्य वस्तुओं तक की कीमतों पर पड़ सकता है।
फिलहाल उपभोक्ता को पंप पर तत्काल राहत जरूर दिख रही है, लेकिन अगर 100 डॉलर से ऊपर का क्रूड लंबे समय तक बना रहा तो इस स्थिरता की कीमत आखिर कौन चुकाएगा—तेल कंपनियां, सरकार या फिर आगे चलकर आम उपभोक्ता?
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