विश्लेषण। इतिहास में ऐसे कई दौर आए हैं जब आर्थिक संकट, बेरोजगारी, संसाधनों की कमी और घरेलू असंतोष ने देशों की विदेश नीति को अधिक आक्रामक बनाया। लेकिन यह कहना कि “तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है” एक निष्कर्ष है, स्थापित तथ्य नहीं। आज दुनिया में कई गंभीर संघर्ष और शक्ति-संघर्ष जरूर चल रहे हैं, मगर उन्हें एक ही वैश्विक युद्ध के रूप में देखना अभी अतिशयोक्ति होगी।
आर्थिक संकट और युद्ध के बीच संबंध भी इतना सीधा नहीं है कि लोकतांत्रिक देश हमेशा जोखिम से बचें और तानाशाही देश हमेशा जोखिम उठाएं। इतिहास इसका अधिक जटिल चित्र दिखाता है। 1930 के दशक की महामंदी के बाद जर्मनी, इटली और जापान में आर्थिक-सामाजिक संकट ने आक्रामक राष्ट्रवाद और विस्तारवादी नीतियों को मजबूत किया। संसाधन, बाजार, सामरिक प्रभुत्व और घरेलू राजनीतिक समर्थन की तलाश ने अंतरराष्ट्रीय तनाव को बढ़ाया। अंततः यही परिस्थितियां द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि का हिस्सा बनीं।
लेकिन दूसरी तरफ लोकतांत्रिक देशों ने भी इतिहास में बड़े सैन्य जोखिम लिए हैं। अमेरिका का द्वितीय विश्वयुद्ध में प्रवेश, कोरिया और वियतनाम जैसे युद्ध तथा बाद के कई सैन्य हस्तक्षेप इसका प्रमाण हैं। इसलिए लोकतंत्र बनाम तानाशाही का अंतर युद्ध की संभावना को प्रभावित कर सकता है, लेकिन उसे अकेले तय नहीं करता।
आज की दुनिया में असली खतरा क्या है?
आज वैश्विक अर्थव्यवस्था कई दबावों से गुजर रही है—ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, व्यापारिक टकराव, कर्ज और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण। साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट और अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसी घटनाएं दुनिया को कई मोर्चों पर तनावपूर्ण बना रही हैं।
सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब आर्थिक संकट + राष्ट्रवाद + सैन्य विस्तार + कमजोर कूटनीतिक संवाद एक साथ आ जाएं। ऐसी स्थिति में किसी सीमित संघर्ष के गलत आकलन से बड़ा युद्ध पैदा हो सकता है।
क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
इतिहास हूबहू दोहराता नहीं, लेकिन उसके पैटर्न चेतावनी जरूर देते हैं। 1930 के दशक की सबसे बड़ी सीख यह है कि आर्थिक संकट अपने आप विश्वयुद्ध नहीं कराता। खतरा तब बढ़ता है जब आर्थिक असुरक्षा को आक्रामक राष्ट्रवाद, विस्तारवाद, हथियारों की दौड़ और कमजोर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ जोड़ दिया जाता है।
आज परमाणु हथियार भी एक बड़ा अंतर पैदा करते हैं। बड़े देशों के बीच सीधा युद्ध केवल सैन्य जीत का सवाल नहीं, बल्कि संभावित विनाश का प्रश्न है। यही कारण है कि कई शक्तियां प्रत्यक्ष टकराव के बजाय प्रतिनिधि संघर्ष, आर्थिक प्रतिबंध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और कूटनीतिक दबाव का इस्तेमाल करती हैं।
इसलिए सवाल यह नहीं कि तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या दुनिया उन परिस्थितियों को बनने दे रही है, जिनसे कोई क्षेत्रीय संकट वैश्विक टकराव में बदल सकता है?
इतिहास का संदेश साफ है—आर्थिक संकट से ज्यादा खतरनाक वह राजनीतिक प्रतिक्रिया होती है, जो संकट का समाधान सहयोग में नहीं, संघर्ष में तलाशने लगे।

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