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भावनाएं फॉरवर्ड नहीं होतीं, रिश्तों को ‘री-सीव’ करना पड़ता है

प्रणव बजाज

आज हमारे पास बात करने के साधन जितने बढ़े हैं, बातचीत उतनी ही घट गई है। घर में सामने बैठा आदमी मोबाइल पर संदेश भेज रहा है और दफ्तर में दो कदम दूर बैठा सहकर्मी ई-मेल। जवाब भी बातचीत से नहीं, एक अंगूठे से निकलता है—‘ओके’, ‘के’ या फिर एक थंब्स-अप।



सवाल यह है कि हमने संचार को आसान बनाया है या इंसान को एक-दूसरे से दूर कर दिया है?


कभी चिट्ठी लिखना किसी भावना को शब्द देना था। शब्दों के साथ इंतजार था, बेचैनी थी, अपनापन था। आज संदेश भेजने में एक सेकंड लगता है और जवाब देने में भी। लेकिन इसी तेजी ने संवाद से भावनाएं निकाल दी हैं। संदेश पहुंच रहे हैं, मगर मन नहीं पहुंच रहा।


घर में पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चे एक ही छत के नीचे रहते हैं, लेकिन कई बार संवाद मोबाइल की स्क्रीन पर होता है। दफ्तर में सहकर्मी आमने-सामने बैठे हैं, फिर भी बातचीत की जगह मेल, सीसी और फॉरवर्ड ने ले ली है। जिम्मेदारी भी अब काम से ज्यादा ‘मेल भेज देने’ तक सीमित होती जा रही है—‘मैंने तो मेल कर दिया था।’


यही वह जगह है जहां ‘सहयोग’ मरता है और सिर्फ ‘संचार’ बचता है।


किसी संस्था को चलाने के लिए केवल आदेश, ई-मेल और बैठकें काफी नहीं होतीं। लोगों के बीच भरोसा चाहिए, संवाद चाहिए और वह सहज संपर्क चाहिए जिसमें एक कर्मचारी दूसरे की परेशानी को बिना किसी औपचारिकता के समझ सके। प्रबंधन की दुनिया में इसे ‘चलते-फिरते प्रबंधन’ की अवधारणा से समझाया गया—कुर्सी पर बैठकर सब कुछ नियंत्रित करने के बजाय लोगों के बीच जाइए, उनसे मिलिए और सुनिए।


लेकिन आज कुर्सी छोड़ना ही सबसे कठिन काम हो गया है।


विडंबना देखिए—कर्मचारी सामने बैठा है, फिर भी उसे संदेश भेजा जा रहा है। परिवार का सदस्य दूसरे कमरे में है, फिर भी मोबाइल पर सूचना पहुंच रही है। घर और बाजार के बीच जो दूरी कभी रिश्तों को बचाती थी, वह दूरी अब मिट गई है। बाजार घर में घुस आया है और घर बाजार की भाषा बोलने लगा है।


अब इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी शामिल हो गई है। वह ई-मेल लिख सकती है, जवाब तैयार कर सकती है, लंबा संदेश छोटा कर सकती है और इनबॉक्स संभाल सकती है। लेकिन क्या वह किसी मां की आवाज में छिपी चिंता समझ सकती है? क्या वह किसी दोस्त की चुप्पी का अर्थ जान सकती है? क्या वह सामने बैठकर किसी कर्मचारी के चेहरे से उसकी परेशानी पढ़ सकती है?


तकनीक काम आसान कर सकती है, रिश्ते नहीं।


हमने सुविधा के नाम पर संवाद की मेहनत छोड़ दी है। फोन करने में समय लगता है, मिलने के लिए कुर्सी से उठना पड़ता है, चिट्ठी लिखने के लिए मन लगाना पड़ता है। इसलिए हमने सबसे आसान रास्ता चुना—फॉरवर्ड।


लेकिन फॉरवर्ड किए हुए संदेश में आपका व्यक्तित्व कहां है? आपकी आवाज कहां है? आपकी संवेदना कहां है?


एक हाथ से लिखी चिट्ठी में टेढ़े-मेढ़े अक्षर भी अपना परिचय देते थे। शब्दों में लिखने वाले की धड़कन महसूस होती थी। आज हमारे पास हजारों संदेश हैं, लेकिन उनमें से कितने ऐसे हैं जिन्हें हम संभालकर रखना चाहते हैं?


इसलिए सवाल तकनीक छोड़ने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या तकनीक के बीच हम इंसान बने रहेंगे?


कभी मोबाइल नीचे रखिए। सामने बैठे व्यक्ति से बात कीजिए। दफ्तर में सहकर्मी की मेज तक जाइए। घर में दूसरे कमरे तक चलकर जाइए। किसी पुराने दोस्त को फोन कीजिए। और कभी-कभार कागज पर अपने हाथ से कुछ लिखिए।


क्योंकि मेल के पास फॉन्ट होता है, संदेश के पास इमोजी होता है, लेकिन आपकी लिखावट में आपका किरदार होता है।


याद रखिए—भावनाएं फॉरवर्ड नहीं होतीं।


उन्हें कहना पड़ता है, सुनना पड़ता है और सबसे जरूरी—जीना पड़ता है।


और शायद आज की सबसे बड़ी जरूरत यही है—इनबॉक्स खाली करने से पहले दिल और रिश्तों के बीच जमा हुआ फासला खाली किया जाए।

कुछ पंक्तियां आज के समय पर जैसे सवाल बनकर खड़ी हैं—


‘पहले बहुत फासला था बाजार से घर का,

अब एक ही कमरे में है बाजार भी, घर भी।’


अब तय हमें करना है—घर में इंसान रहेगा या सिर्फ नेटवर्क?

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