पश्चिम बंगाल में राष्ट्रवाद और ‘वंदे मातरम्’ को लेकर राजनीतिक टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने कहा है कि राज्य में रहने वाले हर व्यक्ति को ‘वंदे मातरम्’ गाना होगा। उन्होंने साफ किया कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति के मुद्दे पर किसी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अधिकारी ने जादवपुर विश्वविद्यालय में कथित राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों को वैचारिक राजनीति का अखाड़ा बनाने के बजाय देश और संविधान के प्रति जिम्मेदारी को प्राथमिकता देनी चाहिए।
हालांकि, इस बयान ने एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या किसी व्यक्ति को राष्ट्रगीत या देशभक्ति के किसी प्रतीक को अनिवार्य रूप से अपनाने के लिए बाध्य किया जा सकता है? ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना से गहराई से जुड़ा गीत है, लेकिन नागरिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों को लेकर ऐसे बयानों पर बहस स्वाभाविक है।
बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा भाजपा और उसके विरोधियों के बीच नए टकराव का आधार बन सकता है। सवाल अब केवल ‘वंदे मातरम्’ गाने का नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद की राजनीतिक परिभाषा और नागरिक अधिकारों की सीमा का भी है।
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