व्यंग्य | प्रणव बजाज
वोट बैंक की राजनीति में अब मर्यादा की भी नीलामी होगी क्या? कांग्रेस सहित किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं से सवाल है—हिंदुओं की आस्था, सनातन धर्म और धार्मिक प्रतीकों का अपमान करके आखिर कौन-सी राजनीति की जा रही है?
कांग्रेस पार्टी से सीधा सवाल है—अगर उसके किसी नेता या समर्थक की ओर से सनातन धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल की जाती है, तो पार्टी का नेतृत्व उस भाषा पर स्पष्ट कार्रवाई क्यों नहीं करता? क्या चुनावी लाभ के लिए धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली भाषा को नजरअंदाज किया जा सकता है?
राजनीति में कांग्रेस भाजपा की आलोचना करे, सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और विकास के मुद्दे उठाए—जनता सुनने को तैयार है। लेकिन किसी धर्म को गाली देना राजनीतिक बहस नहीं हो सकती।
कांग्रेस के बड़े नेताओं को यह भी सोचना चाहिए कि उनके कार्यकर्ता और समर्थक सार्वजनिक मंचों पर जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उसका असर केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहता। वही भाषा समाज में जाती है, फिर घरों में पहुंचती है और धीरे-धीरे बच्चों की सोच का हिस्सा बन सकती है।
तो सवाल कांग्रेस से ही नहीं, हर राजनीतिक दल से है—आप अपने बच्चों को क्या शिक्षा दे रहे हैं?
क्या उन्हें यह बताया जाएगा कि सत्ता पाने के लिए दूसरे की आस्था का अपमान किया जा सकता है?
क्या विरोधी विचारधारा को हराने का मतलब उसके धर्म और विश्वास को निशाना बनाना है?
क्या वोट बैंक इतना बड़ा हो गया कि सामाजिक मर्यादा छोटी पड़ गई?
भारत में धर्म के प्रति सम्मान का अर्थ किसी दूसरे धर्म के प्रति नफरत नहीं है। अपनी आस्था पर गर्व कीजिए, लेकिन दूसरे की आस्था का अपमान मत कीजिए। यही लोकतांत्रिक और सभ्य समाज की पहचान है।
कांग्रेस को भी स्पष्ट करना चाहिए कि सनातन धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक बयान पार्टी की नीति है या किसी व्यक्ति की निजी सोच? अगर पार्टी ऐसी भाषा का समर्थन नहीं करती, तो फिर सार्वजनिक रूप से उसकी निंदा और संगठनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं?
जनता को मंदिर-मस्जिद की लड़ाई नहीं चाहिए। जनता को रोजगार चाहिए, शिक्षा चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए, सुरक्षा चाहिए और भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए।
नेताओं को वोट मिल सकता है, लेकिन समाज को क्या मिल रहा है?
आज मंच पर बोली गई एक गाली तालियां और वोट दिला सकती है, लेकिन कल वही शब्द किसी बच्चे की जुबान पर होंगे।
इसलिए कांग्रेस सहित हर राजनीतिक दल से एक ही सवाल—
आप सत्ता के लिए कैसी राजनीति छोड़कर जा रहे हैं और अपनी अगली पीढ़ी के लिए कैसी भाषा छोड़कर जा रहे हैं?
क्योंकि चुनाव पांच साल बाद फिर आएगा,
लेकिन समाज में बोए गए शब्दों का असर पीढ़ियों तक रहता है।

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