कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने नए संसद भवन की बनावट और वहां सांसदों के बीच संवाद को लेकर सवाल उठाए हैं। 20 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान थरूर ने नए भवन को “बेजान कॉन्फ्रेंस सेंटर” जैसा बताते हुए कहा कि पुराने संसद भवन में जो अपनापन और सहजता महसूस होती थी, वह नए भवन में कम दिखाई देती है।
थरूर के मुताबिक पुराने सदन की बनावट ऐसी थी, जहां सांसद एक-दूसरे के करीब रहते थे और सदन के बाहर भी अनौपचारिक बातचीत के मौके आसानी से मिल जाते थे। इसके उलट नए भवन में बैठने की व्यवस्था पंखे जैसी आकृति में है, जिससे सांसदों के बीच दूरी का अहसास होता है। उन्होंने इस भौतिक दूरी को मौजूदा राजनीतिक ध्रुवीकरण से भी जोड़कर देखा।
उनकी सबसे बड़ी आपत्ति केंद्रीय कक्ष के अभाव को लेकर है। पुराने संसद भवन का केंद्रीय कक्ष सांसदों, पूर्व सांसदों, पत्रकारों और संसद से जुड़े लोगों के बीच अनौपचारिक मुलाकात और बातचीत का महत्वपूर्ण स्थान था। थरूर का मानना है कि नए परिसर में ऐसी जगह की कमी ने विभिन्न दलों के नेताओं के बीच सहज संवाद और मेलजोल को प्रभावित किया है।
हालांकि थरूर ने नए भवन की कुछ व्यावहारिक खूबियों को भी स्वीकार किया। उन्होंने माना कि पुराने भवन में सीटों और गलियारों की व्यवस्था के कारण आने-जाने में परेशानी होती थी, जिसे नए भवन में बेहतर किया गया है।
सवाल अब सिर्फ भवन की खूबसूरती या आधुनिक सुविधाओं का नहीं है। क्या संसद की इमारत ऐसी होनी चाहिए जो सांसदों को सिर्फ बैठाए, या ऐसी भी हो जो राजनीतिक मतभेदों के बीच संवाद की जगह बनाए? थरूर की टिप्पणी ने इसी बड़े सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है।

Post a Comment