प्रमोशन की फाइल में दाग छिपे तो किसकी जिम्मेदारी?

भोपाल। मध्यप्रदेश पुलिस मुख्यालय में पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर सामने आई गड़बड़ी ने विभागीय निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिव्यू विभागीय पदोन्नति समिति ने करीब 35 पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के मामलों की समीक्षा की है। इनमें ऐसे नाम भी बताए गए हैं, जिन पर फर्जी मेडिकल बिल, छेड़खानी के प्रकरण या केंद्रीय जांच एजेंसी की जांच चल रही थी। 



सबसे चौंकाने वाला मामला कथित मेडिकल बिल घोटाले से जुड़ा है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस मुख्यालय की जांच में 48 कर्मचारियों की भूमिका सामने आई थी। फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर सरकारी राशि के भुगतान का मामला सामने आने के बाद तीन कर्मचारियों की गिरफ्तारी भी हुई थी। इसके बावजूद कुछ कर्मचारियों की सेवा अभिलेखों में अच्छी प्रविष्टियां दर्ज हुईं और बाद में पदोन्नति का रास्ता खुल गया। 


इसी मामले में एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 16 ऐसे पुलिसकर्मी पदोन्नति सूची में शामिल थे, जिनसे सरकारी राशि की वसूली की प्रक्रिया चल रही थी। शिकायत के बाद अब विभाग ने पूरे मामले की दोबारा समीक्षा की है। 


सवाल यह नहीं कि गलती हुई या नहीं। सवाल यह है कि जिन अधिकारियों ने सेवा अभिलेख तैयार किए, पदोन्नति की जांच की और समिति के सामने मामले रखे—उनकी जिम्मेदारी कौन तय करेगा?


यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर मामला लंबित था, तो पदोन्नति से पहले उसकी जानकारी संबंधित शाखा तक पहुंचनी चाहिए थी। अगर जानकारी पहुंची थी और फिर भी पदोन्नति हुई, तो मामला और गंभीर है। और यदि जानकारी ही नहीं पहुंची, तो विभागीय सूचना व्यवस्था पर सवाल है।


रिव्यू समिति की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और संबंधित कर्मचारियों को पुराने पदों पर वापस भेजने के आदेश जल्द जारी होने की बात कही गई है। उच्च न्यायालय ने भी मामले में गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, संबंधित पुलिसकर्मियों तथा पदोन्नति प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों से जवाब मांगा है। 


अब सिर्फ 35 लोगों की पदोन्नति वापस लेना पर्याप्त नहीं होगा। असली सवाल उस पूरी श्रृंखला का है जिसने दागदार सेवा रिकॉर्ड को पदोन्नति योग्य बना दिया।


**बौद्धिक प्रतिकार का सवाल—दागी को प्रमोशन मिला, लेकिन प्रमोशन देने वालों की जवाबदेही कब तय होगी?**

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