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सड़क की गुणवत्ता जांचने वाले कौन?

एपिसोड-5 :

प्रयोगशाला नहीं बनी, फिर भी 39.10 करोड़ के भुगतान! मानक से कमजोर पीक्यूसी-डीएलसी के बावजूद ठेकेदारों को 6.43 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान—सीएजी ने गुणवत्ता जांच की पूरी व्यवस्था पर उठाए सवाल


प्रणव बजाज

मध्यप्रदेश में सड़क बनती है तो सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि ठेका किसे मिला।

असल सवाल यह है कि सड़क में डाली गई सामग्री की जांच किसने की?

कंक्रीट की ताकत किसने प्रमाणित की?

प्रयोगशाला किसने देखी?

माप पुस्तिका में काम किसने दर्ज किया?

गुणवत्ता प्रमाणपत्र किसने दिया?

और अंत में सरकारी खजाने से भुगतान किसके हस्ताक्षर से निकला?

भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की सड़क विकास संबंधी रिपोर्ट ने इन्हीं सवालों को सामने खड़ा किया है।



रिपोर्ट में गुणवत्ता नियंत्रण की ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसमें कई जगह प्रयोगशाला समय पर नहीं बनी, आवश्यक परीक्षण नहीं हुए, परीक्षण अभिलेख अधूरे मिले और कमजोर कंक्रीट के बावजूद भुगतान कर दिया गया।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब गुणवत्ता जांच की पहली सीढ़ी ही कमजोर थी तो सड़क को पास किस आधार पर किया गया

79 सड़कों पर प्रयोगशाला ही देर से!


सीएजी ने 20 लोक निर्माण विभाग संभागों के 79 सड़क कार्यों में पाया कि ठेकेदारों ने निर्धारित समय पर क्षेत्रीय प्रयोगशालाएं स्थापित नहीं कीं।


देरी मामूली नहीं थी।


दो महीने से लेकर 56 महीने तक।


नियम के मुताबिक अनुबंध पर हस्ताक्षर के 30 दिन के भीतर क्षेत्रीय प्रयोगशाला स्थापित होनी थी। ऐसा नहीं करने पर अनुबंध राशि का एक प्रतिशत प्रतिमाह, अधिकतम 50 हजार रुपये प्रतिमाह की दर से दंड का प्रावधान था।


सीएजी ने गणना की कि इन मामलों में कम से कम 5.28 करोड़ रुपये की वसूली होनी चाहिए थी।


लेकिन विभाग ने यह दंड नहीं लगाया।


यानी ठेकेदार ने प्रयोगशाला नहीं बनाई या देर से बनाई और विभाग ने उस पर लगने वाला दंड भी नहीं वसूला।


अब सवाल—


इन 5.28 करोड़ रुपये की वसूली किस अधिकारी ने रोक दी?




प्रयोगशाला की पुष्टि किए बिना 39.10 करोड़ का भुगतान!


मामला यहीं खत्म नहीं होता।


सीएजी ने 12 संभागों के 60 सड़क कार्यों में पाया कि क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं की स्थापना और तकनीकी कर्मचारियों की तैनाती की अनिवार्य पुष्टि के अभिलेख उपलब्ध नहीं थे।


नियम साफ था।


पांच करोड़ रुपये तक के कार्यों में अधीक्षण अभियंता और पांच करोड़ रुपये या उससे अधिक के कार्यों में मुख्य अभियंता को प्रयोगशाला तथा तकनीकी कर्मचारियों की पुष्टि करनी थी।


उसके बाद ही पहला चलित भुगतान किया जा सकता था।


लेकिन सीएजी ने पाया कि पुष्टि के अभाव में भी ठेकेदारों को पहला चलित भुगतान कर दिया गया।


कुल राशि—


39.10 करोड़ रुपये।


सरकार ने जवाब में कहा कि प्रयोगशालाएं स्थापित थीं और परीक्षण किए गए थे।


लेकिन सीएजी ने इस जवाब को स्वीकार नहीं किया।


क्यों?


क्योंकि जरूरी सत्यापन रिपोर्ट फाइल में नहीं थीं।


यानी सवाल सिर्फ प्रयोगशाला बनी या नहीं, इसका नहीं है।


सवाल है—क्या संबंधित अधिकारियों ने उसे देखकर प्रमाणित किया था?


और यदि प्रमाणित नहीं किया था तो पहला भुगतान किस आधार पर हुआ?




75 सड़कें, जरूरी सामग्री परीक्षण का रिकॉर्ड गायब


सीएजी ने 15 संभागों के 75 सड़क कार्यों में सामग्री के आवश्यक परीक्षणों की व्यवस्था में कमी पकड़ी।


सरकार के नियमों के अनुसार निर्धारित अनुपात में परीक्षण विभागीय अथवा मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में होना था।


लेकिन लेखापरीक्षा को केवल 13 सड़कों के लिए ऐसे परीक्षण अभिलेख उपलब्ध कराए गए।


सीएजी ने कहा कि कुछ नमूने दिखा देना पूरे निर्माण की गुणवत्ता प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।


यानी सवाल फिर वही—


जिस सड़क के लिए परीक्षण रिपोर्ट ही पूरी नहीं है, उसे गुणवत्तापूर्ण किस आधार पर माना गया?




अब आता है सबसे बड़ा खुलासा—6.43 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान


सीएजी ने पांच संभागों के 11 सड़क कार्यों में पीक्यूसी और डीएलसी की संपीड़न क्षमता निर्धारित मानकों से काफी कम पाई।


पीक्यूसी यानी सड़क की मजबूत कंक्रीट परत।


डीएलसी यानी उसके नीचे की सूखी कंक्रीट आधार परत।


नियमों के अनुसार निर्धारित मजबूती नहीं मिलने पर निर्माण को स्वीकार करने की स्थिति में भी भुगतान दर में कटौती की जानी चाहिए थी।


लेकिन सीएजी के मुताबिक विभाग ने कमजोर निर्माण को स्वीकार किया और भुगतान में आवश्यक कटौती नहीं की।


परिणाम—


ठेकेदारों को 6.43 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान।


यह रकम सीएजी की लेखापरीक्षा गणना है।


इसे सीधे चोरी या सिद्ध भ्रष्टाचार कहना सही नहीं होगा, लेकिन यह जरूर सवाल है कि मानक से कम गुणवत्ता वाले काम पर भुगतान क्यों हुआ?


सरकार ने जवाब में कहा कि घन परीक्षण में कमी आने पर मूल सड़क से नमूना लेकर परीक्षण किया जाता है और यदि वह मानक पर मिलता है तो कटौती नहीं की जाती।


लेकिन सीएजी ने इस जवाब को स्वीकार नहीं किया।


रिपोर्ट के अनुसार फाइल में मौजूद घन परीक्षणों में एम-40 कंक्रीट की मजबूती करीब 40 एन/वर्ग मिमी थी, जबकि डिजाइन के अनुसार लक्षित मजबूती 48.25 एन/वर्ग मिमी थी।


यानी अंतर छोटा नहीं था।




सीएजी के सामने 11 सड़क कार्य कौन से थे?


रिपोर्ट के परिशिष्ट में कमजोर पीक्यूसी-डीएलसी से संबंधित सड़क कार्यों के रूप में ये नाम दर्ज हैं—


नर्मदापुरम संभाग


• सोहापुर–भटगांव सड़क

• इटारसी–जमानी सड़क

• बाबई–बागरा–नसीराबाद सड़क


शिवपुरी संभाग


• मायापुर–खनियाधाना–गुड्डर रोड से रेड्डी चौराहा सड़क

• मैगरोनी–धोलागढ़–डोंगरी सड़क


उज्जैन संभाग


• महिदपुर से कचरिया सड़क


सिंगरौली संभाग


• एनएच-39 से औद्योगिक क्षेत्र मोरवा सड़क


इन परिशिष्टों में दर्ज मात्रा और दरों के आधार पर सीएजी ने कुल 12.01 करोड़ रुपये से अधिक के काम को उप-मानक निष्पादन से संबंधित बताया है; जबकि अलग लेखापरीक्षा निष्कर्ष में आवश्यक भुगतान कटौती न करने से 6.43 करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान की गणना की गई है।


इसलिए दोनों आंकड़ों को एक ही चीज मानना गलत होगा।


12.01 करोड़ रुपये संबंधित कार्यों की परिशिष्ट में दर्शाई गई राशि है।


6.43 करोड़ रुपये सीएजी द्वारा अतिरिक्त भुगतान के रूप में चिन्हित राशि है।




क्या परीक्षण रिपोर्ट भी सवालों से बाहर नहीं?


मामला और गंभीर तब हो जाता है जब सीएजी ने नमूनों की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।


मंदसौर संभाग के तीन सड़क कार्यों में लिए गए कंक्रीट नमूनों की ऊंचाई और वास्तविक सड़क की मोटाई के बीच 5 से 30 मिलीमीटर तक का अंतर मिला।


जबकि निर्धारित सहनशीलता इससे बहुत कम थी।


सीएजी ने लिखा कि इतना बड़ा अंतर इस सवाल को जन्म देता है कि—


या तो स्लिप फॉर्म पेवर का उपयोग नहीं हुआ, जबकि उसका भुगतान किया गया, या परीक्षण परिणामों की विश्वसनीयता पर सवाल है।


रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि कुछ परीक्षण अभिलेखों में परीक्षण की तारीख थी, लेकिन कंक्रीट डालने की तारीख दर्ज नहीं थी।


इससे कंक्रीट की वास्तविक उम्र निर्धारित करना संभव नहीं था।


यह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं है।


क्योंकि कंक्रीट की मजबूती का परीक्षण उसकी उम्र से सीधे जुड़ा होता है।




ठेकेदार ने स्लिप फॉर्म पेवर चलाया या कागजों में चला?


सीएजी ने यह भी पाया कि कुछ मामलों में स्लिप फॉर्म पेवर के इस्तेमाल से संबंधित भुगतान किया गया, लेकिन आवश्यक कटौती नहीं की गई।


रिपोर्ट के अनुसार यदि निर्धारित मशीन का इस्तेमाल नहीं हुआ तो 350 रुपये प्रति घन मीटर की दर से संबंधित मात्रा पर कटौती होनी थी।


लेकिन विभाग ने पूरा भुगतान किया।


अब सवाल—


मशीन साइट पर थी?


उसका संचालन हुआ?


माप पुस्तिका में किसने दर्ज किया?


अभियंता ने इसका सत्यापन कैसे किया?




निजी विक्रेता से 12.90 करोड़ का डामर


गुणवत्ता जांच में बिटुमेन भी सवालों के घेरे में आया।


सीएजी ने तीन संभागों के चार सड़क कार्यों में पाया कि ठेकेदारों ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल रिफाइनरियों से बिटुमेन खरीदने के बजाय निजी विक्रेताओं से बिटुमेन खरीदा।


कुल मात्रा—


4,355 टन।


कुल राशि—


12.90 करोड़ रुपये।


सीएजी के अनुसार विभाग ने यह सुनिश्चित करने के लिए बिलों की पर्याप्त जांच नहीं की कि बिटुमेन निर्धारित रिफाइनरियों से ही खरीदा गया था।


सरकार ने कहा कि रिफाइनरियों में रखरखाव अथवा उपलब्धता की समस्या के कारण निजी स्रोत से खरीद की अनुमति दी गई थी।


लेकिन सीएजी ने इसके समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज नहीं पाए।


सवाल—


बिटुमेन की गुणवत्ता किसने प्रमाणित की?




9.25 करोड़ के ह्यूम पाइप भी बिना प्रमाणन?


11 संभागों के 47 सड़क कार्यों में सीएजी ने ह्यूम पाइप की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर आपत्ति दर्ज की।


इन पाइपों पर भारतीय मानक संस्था का चिह्न अथवा संबंधित प्रमाणन होना चाहिए था।


लेकिन लेखापरीक्षा में ठेकेदारों की ओर से प्रमाणपत्र और मूल खरीद बिल उपलब्ध नहीं कराए गए।


सीएजी ने ऐसे बिना प्रमाणन वाले ह्यूम पाइपों के उपयोग की राशि करीब—


9.25 करोड़ रुपये


बताई।


सरकार ने कहा कि पाइप निर्धारित विनिर्देशों के अनुसार थे।


लेकिन सीएजी ने फाइल अभिलेखों के आधार पर सरकार का जवाब स्वीकार नहीं किया।




बारिश में भी सड़क बिछती रही!


सीएजी ने तीन संभागों के तीन सड़क कार्यों में बारिश के मौसम में बिटुमिनस काम किए जाने की बात भी दर्ज की।


बैतूल स्टेशन रोड


12 से 15 अगस्त 2018


नौगांव–बलदेवगढ़ सड़क


12 से 20 जुलाई 2019


धीराैली से पुरानी धीराैली संपर्क सड़क


11 सितंबर 2019


नियमों के अनुसार बारिश, सतह पर पानी, धुंध या प्रतिकूल परिस्थितियों में बिटुमिनस परत बिछाने पर रोक है।


विभाग ने कहा कि उस समय बारिश नहीं हुई थी।


लेकिन सीएजी ने जवाब स्वीकार नहीं किया और कहा कि बारिश के मौसम में आधार परत और बाइंडर परत की नमी तथा तापमान निर्माण की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।




अब भुगतान की आखिरी सीढ़ी भी सवालों में


सीएजी ने सात संभागों के 20 सड़क कार्यों में अंतिम भुगतान समय-विस्तार की स्वीकृति से पहले किए जाने की बात दर्ज की।


इसके अलावा 10 संभागों के 14 सड़क कार्यों में अंतिम समय-विस्तार ही अधीक्षण अभियंता द्वारा नहीं दिया गया था।


फिर भी कार्यपालन अभियंताओं ने—


9.33 करोड़ रुपये


का अंतिम भुगतान कर दिया।


सीएजी के अनुसार इससे देरी पर लगने वाले दंड की वसूली प्रभावित हुई।


यानी सवाल सिर्फ सड़क बनाने तक नहीं है।


अंतिम भुगतान किसने रोका?


किसने समय-विस्तार देखा?


किसने दंड की गणना की?


और किसके हस्ताक्षर के बाद ठेकेदार को पूरा भुगतान मिला?




प्रमाणपत्र की तारीख और सड़क का काम—दोनों अलग!


रायसेन की मनकवाड़ा–रिमझा–पिपलिया सड़क में सीएजी ने ऐसा मामला पकड़ा जिसमें निर्माण पूरा होने का प्रमाणपत्र 30 दिसंबर 2020 को जारी किया गया।


लेकिन बाद में काम जारी रहने के दस्तावेज सामने आए।


सीएजी ने बताया कि करीब 1.07 करोड़ रुपये का काम प्रमाणपत्र जारी होने के बाद किया गया।


रिपोर्ट ने इसे गंभीर मामला मानते हुए आगे जांच की आवश्यकता बताई।


यहां सवाल सीधा है—


अगर सड़क पूरी हो गई थी तो उसके बाद 1.07 करोड़ रुपये का काम किस प्रमाणपत्र के आधार पर हुआ?




शाहपुर–भायावाड़ी में भी प्रमाणपत्र पर सवाल


बैतूल की शाहपुर–भायावाड़ी सड़क में भौतिक पूर्णता प्रमाणपत्र 31 मार्च 2021 की तारीख का था।


लेकिन माप पुस्तिका में अंतिम हार्ड शोल्डर माप 30 जून 2021 दर्ज था।


विभाग ने इसे अभिलेखीय गलती बताया।


सीएजी ने कहा कि ऐसी विसंगति से वास्तविक पूर्णता तिथि पर सवाल उठता है और इससे ठेकेदार को दोष-दायित्व अवधि में अनुचित लाभ मिलने की संभावना बनती है।




अब सवाल उन अधिकारियों से जिनके हस्ताक्षर से व्यवस्था चलती है


सीएजी की रिपोर्ट में हर मामले में व्यक्तिगत अधिकारी का नाम नहीं दिया गया है।


लेकिन जिम्मेदारी की प्रशासनिक कड़ी स्पष्ट है—


मुख्य अभियंता


बड़े कार्यों में क्षेत्रीय प्रयोगशाला और तकनीकी स्टाफ के सत्यापन की जिम्मेदारी।


अधीक्षण अभियंता


छोटे कार्यों में प्रयोगशाला सत्यापन तथा समय-विस्तार जैसी महत्वपूर्ण स्वीकृतियां।


कार्यपालन अभियंता


कार्य का निष्पादन, माप, बिल और अंतिम भुगतान की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका।


सहायक अभियंता/उपखंडीय अधिकारी


साइट निरीक्षण, परीक्षण और निर्माण की निगरानी की श्रृंखला में भूमिका।


उपयंत्री


मैदानी स्तर पर माप और कार्य की निगरानी से जुड़ी जिम्मेदारी।


लेकिन किसी अधिकारी को दोषी ठहराने से पहले यह जांचना जरूरी है कि संबंधित मामले में उस समय कौन पदस्थ था और उसके हस्ताक्षर किन दस्तावेजों पर थे।


यही अगली जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।




मुख्यमंत्री से सवाल, आरोप नहीं


मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने भी अब सवाल राजनीतिक आरोप का नहीं बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का है।


क्योंकि सीएजी की रिपोर्ट विधानसभा में रखी जा चुकी है।


सरकार को बताना चाहिए—


5.28 करोड़ रुपये का प्रयोगशाला दंड कितना वसूला गया?


39.10 करोड़ रुपये के भुगतान से पहले सत्यापन क्यों नहीं हुआ?


6.43 करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान की वसूली हुई या नहीं?


9.25 करोड़ रुपये के बिना प्रमाणित ह्यूम पाइप मामले में क्या कार्रवाई हुई?


12.90 करोड़ रुपये के निजी बिटुमेन खरीद मामले में जिम्मेदारी किसकी तय हुई?


9.33 करोड़ रुपये के अंतिम भुगतान में समय-विस्तार और दंड का परीक्षण किसने किया?


और सबसे महत्वपूर्ण—


क्या सीएजी की इन आपत्तियों के आधार पर जिम्मेदार अधिकारियों की विभागीय जवाबदेही तय हुई?




यह सिर्फ सड़क की गुणवत्ता का मामला नहीं


सीएजी की रिपोर्ट में सामने आई तस्वीर को जोड़कर देखें तो एक पूरी श्रृंखला दिखाई देती है—


ठेकेदार ने सामग्री खरीदी।


विभाग ने उसे स्वीकार किया।


प्रयोगशाला स्थापित हुई या नहीं—यह विभाग को देखना था।


परीक्षण हुए या नहीं—यह रिकॉर्ड में होना था।


सड़क की मजबूती निर्धारित स्तर की है या नहीं—यह जांचना था।


माप पुस्तिका में काम दर्ज हुआ।


गुणवत्ता प्रमाणित हुई।


और फिर सरकारी भुगतान हुआ।


अगर इस पूरी श्रृंखला में कहीं भी जांच कमजोर हुई तो उसका बोझ अंततः जनता पर आता है।


सड़क टूटती है तो जनता चलती है।


पैसा जाता है तो जनता का जाता है।


लेकिन कागज पर सड़क पास करने वाले कौन थे?




बौद्धिक प्रतिकार के 10 सीधे सवाल


1. 79 सड़क कार्यों में प्रयोगशाला 2 से 56 महीने देर से क्यों बनी?


2. 5.28 करोड़ रुपये का संभावित दंड क्यों नहीं वसूला गया?


3. प्रयोगशाला सत्यापन के बिना 39.10 करोड़ रुपये का पहला भुगतान कैसे हुआ?


4. 75 सड़क कार्यों में आवश्यक प्रयोगशाला परीक्षणों के अभिलेख क्यों नहीं मिले?


5. मानक से कम पीक्यूसी-डीएलसी के बावजूद 6.43 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान क्यों हुआ?


6. मंदसौर में कंक्रीट के नमूनों की मोटाई में 5 से 30 मिलीमीटर तक का अंतर कैसे आया?


7. 12.90 करोड़ रुपये के निजी बिटुमेन उपयोग की गुणवत्ता और स्रोत की पुष्टि किसने की?


8. 9.25 करोड़ रुपये के ह्यूम पाइपों के प्रमाणपत्र कहां हैं?


9. 9.33 करोड़ रुपये का अंतिम भुगतान समय-विस्तार के बिना कैसे हुआ?


10. 1.07 करोड़ रुपये का काम पूर्णता प्रमाणपत्र जारी होने के बाद कैसे हुआ?




सबसे बड़ा सवाल


सरकार ठेकेदार से जवाब मांग सकती है।


ठेकेदार पर दंड लगा सकती है।


काली सूची में डाल सकती है।


लेकिन जनता का सवाल उससे बड़ा है—


जिस अधिकारी ने कमजोर सड़क को मजबूत बताया, जिस अधिकारी ने माप दर्ज किया, जिस अधिकारी ने गुणवत्ता स्वीकार की और जिस अधिकारी ने भुगतान की राह साफ की—उसकी जवाबदेही कब तय होगी?


क्योंकि सड़क सिर्फ ठेकेदार नहीं बनाता।


सड़क की गुणवत्ता एक सरकारी प्रमाणन प्रक्रिया से गुजरती है।


और यदि वह प्रक्रिया ही कमजोर हो जाए तो करोड़ों रुपये की सड़क भी कागज पर मजबूत और जमीन पर कमजोर साबित हो सकती है।


बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल जारी रहेगी...


एपिसोड-6 में :


“कागज पर पूरी, जमीन पर अधूरी—सड़क की माप पुस्तिका का खेल?”


माप पुस्तिका, पूर्णता प्रमाणपत्र, अंतिम भुगतान, समय-विस्तार और ठेकेदार को मिले भुगतान की उन प्रविष्टियों की पड़ताल—किसने कितने काम को पूरा दिखाया और जमीन पर वास्तविकता क्या थी?

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