इंदौर। बौद्धिक प्रतिकार
प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश में बिजली वितरण सुधार योजना के कामों पर पांच जिलों में तकनीकी खामियां सामने आने के बाद अब सवाल इंदौर पर टिक गया है। आरडीएसएस के तहत इंदौर क्षेत्र के लिए करीब 175 करोड़ रुपये के कार्य प्रस्तावित किए गए थे, जिनमें नए ग्रिड, ट्रांसफार्मर, लाइन सुधार और पुराने तार बदलने जैसे काम शामिल थे।
लेकिन असली सवाल अब यह नहीं है कि कितने ग्रिड बने।
असली सवाल है—कितना पैसा खर्च हुआ और जमीन पर वास्तव में कितना काम हुआ?
ठेकेदारों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं?
बौद्धिक प्रतिकार अब बिजली कंपनी से सीधा सवाल करता है—
इंदौर आरडीएसएस में काम पाने वाले ठेकेदार कौन हैं?
किस ठेकेदार को कितने करोड़ रुपये का कार्यादेश मिला?
किस निविदा के माध्यम से काम मिला?
कितनी कंपनियों ने निविदा में हिस्सा लिया?
सबसे कम दर किसने लगाई?
कार्यादेश किसके पक्ष में जारी हुआ?
अब तक कितना भुगतान किया गया?
कितनी राशि रोककर रखी गई है?
और जिन कार्यों को पूर्ण बताया गया है, उनका पूर्णता प्रमाणपत्र किस अधिकारी ने जारी किया?
इन सवालों का जवाब केवल प्रेस विज्ञप्ति से नहीं, बल्कि कार्यादेश, माप पुस्तिका, भुगतान अभिलेख और गुणवत्ता जांच रिपोर्ट से मिलना चाहिए।
काम नापने वाला कौन और भुगतान पास करने वाला कौन?
आरडीएसएस की असली कहानी खंभे और तारों से ज्यादा माप और भुगतान की फाइलों में छिपी हो सकती है।
मान लीजिए किसी ठेकेदार को 100 किलोमीटर लाइन डालने का भुगतान किया गया।
तो सवाल होगा—
क्या जमीन पर 100 किलोमीटर लाइन है?
यदि 500 पोल लगाने का भुगतान हुआ तो क्या मौके पर 500 पोल मौजूद हैं?
यदि अर्थिंग, कंक्रीटिंग, सुरक्षा उपकरण और अन्य तकनीकी काम पूर्ण बताए गए हैं तो क्या उनकी स्वतंत्र जांच हुई?
और यदि काम अधूरा है तो पूर्णता प्रमाणपत्र किसने दिया?
यही वह बिंदु है जहां ठेकेदार के साथ-साथ विभागीय अभियंताओं की जवाबदेही तय होती है।
अनूप कुमार सिंह के कार्यकाल पर भी उठेंगे सवाल
मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के प्रबंध निदेशक अनूप कुमार सिंह हैं। कंपनी की सार्वजनिक गतिविधियों में उनके निरीक्षण और अधिकारियों के साथ बैठकों की जानकारी भी सामने आती रही है।
इसलिए इंदौर में आरडीएसएस की प्रगति और गुणवत्ता को लेकर उनसे सवाल पूछना स्वाभाविक है।
बौद्धिक प्रतिकार यह आरोप नहीं लगा रहा कि अनूप कुमार सिंह ने भ्रष्टाचार किया है।
लेकिन सवाल जरूर है—
उनके कार्यकाल में इंदौर में आरडीएसएस के कितने काम पूरे हुए?
कितने काम निर्धारित समय से पीछे चल रहे हैं?
कितने कार्यों में गुणवत्ता संबंधी शिकायतें मिलीं?
कितने ठेकेदारों को नोटिस दिया गया?
कितने भुगतान रोके गए?
कितने अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई?
और यदि शहर में काम की गति धीमी है तो उसकी जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई?
शिवराम सेमिल पर लोकायुक्त कार्रवाई ने बढ़ाई चिंता
इंदौर बिजली व्यवस्था में भ्रष्टाचार के सवाल को हल्के में भी नहीं लिया जा सकता।
जुलाई 2026 में मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के अधीक्षण यंत्री शिवराम सेमिल के इंदौर, पीथमपुर, धार और मुरैना स्थित नौ ठिकानों पर लोकायुक्त पुलिस ने छापे मारे थे।
रिपोर्टों के अनुसार लोकायुक्त की प्रारंभिक जांच में उनकी ज्ञात आय की तुलना में 258 प्रतिशत अधिक संपत्ति का मामला सामने आया और भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत प्रकरण दर्ज किया गया।
यही मामला अब एक और बड़ा सवाल खड़ा करता है—
जब बिजली कंपनी के एक वरिष्ठ अभियंता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच चल रही है, तब इंदौर में उनके कार्यकाल के दौरान स्वीकृत, मापे और भुगतान किए गए बड़े बिजली कार्यों की भी स्वतंत्र जांच क्यों न हो?
यह आरोप नहीं, बल्कि दस्तावेज आधारित जांच की मांग है।
क्या एक अधिकारी की जांच पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है?
अगर किसी वरिष्ठ अभियंता के खिलाफ लोकायुक्त जांच चल रही है तो यह जरूरी नहीं कि उसके अधीन हुए हर काम में गड़बड़ी हुई हो।
लेकिन यह जरूर जरूरी है कि—
उनके द्वारा प्रमाणित कार्यों की सूची निकाली जाए।
किस ठेकेदार का काम उन्होंने मापा?
किस कार्य का भुगतान उनके सत्यापन के बाद हुआ?
किस कार्य की गुणवत्ता उन्होंने प्रमाणित की?
और उन कार्यों की वर्तमान भौतिक स्थिति क्या है?
यही जांच बताएगी कि मामला केवल एक अधिकारी तक सीमित था या व्यवस्था में कहीं और भी समस्या है।
इंदौर में बिजली के खंभे और तार अब सिर्फ तकनीकी मामला नहीं
शहर में जगह-जगह बिजली के खंभों, तारों, ट्रांसफार्मरों और वितरण व्यवस्था को लेकर शिकायतें सामने आती रहती हैं।
आरडीएसएस का उद्देश्य ही वितरण व्यवस्था को मजबूत करना है।
तो फिर जनता पूछ रही है—
करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी अगर पुराने खंभे, अव्यवस्थित तार, सुरक्षा संबंधी कमियां और बार-बार बिजली व्यवधान की शिकायतें बनी रहती हैं तो सुधार का लाभ आखिर किसे मिला?
कंपनी के निविदा पोर्टल पर इंदौर से जुड़े लगातार नए विद्युत कार्यों की निविदाएं भी सामने आ रही हैं। मसलन, 2026 में इंदौर के कनाड़िया क्षेत्र के 33 केवी फीडर की क्षमता बढ़ाने का कार्य भी निविदा प्रक्रिया में दर्ज है।
इसलिए अब केवल नई निविदा जारी करना पर्याप्त नहीं है।
पुराने कामों का हिसाब भी देना होगा।
बौद्धिक प्रतिकार के 10 सवाल
1. इंदौर में आरडीएसएस के सभी ठेकेदारों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं?
2. प्रत्येक ठेकेदार को कितने करोड़ रुपये का कार्यादेश मिला?
3. अब तक प्रत्येक ठेकेदार को कितना भुगतान किया गया?
4. कार्यों की माप पुस्तिका किस अभियंता ने तैयार की?
5. गुणवत्ता प्रमाणपत्र किस अधिकारी ने जारी किया?
6. भुगतान किस अधिकारी की स्वीकृति से हुआ?
7. कितने काम समय सीमा से पीछे हैं?
8. कितने ठेकेदारों को नोटिस या दंड दिया गया?
9. शिवराम सेमिल द्वारा प्रमाणित बड़े कार्यों की स्वतंत्र तकनीकी जांच होगी या नहीं?
10. अनूप कुमार सिंह के कार्यकाल में आरडीएसएस की प्रगति, खर्च और लंबित कार्यों का कार्यवार श्वेतपत्र कब जारी होगा?
अब फाइल खुलेगी—ठेकेदार से लेकर भुगतान तक
बिजली कंपनी चाहे तो इस पड़ताल का जवाब एक दिन में दे सकती है।
उसे केवल चार दस्तावेज सार्वजनिक करने होंगे—
कार्यादेश।
माप पुस्तिका।
भुगतान विवरण।
गुणवत्ता जांच रिपोर्ट।
इन चार दस्तावेजों से साफ हो जाएगा कि इंदौर में बिजली सुधार वास्तव में जमीन पर हुआ है या फाइलों में।
बौद्धिक प्रतिकार अब अगली कड़ी में इंदौर आरडीएसएस के प्रत्येक बड़े कार्यादेश की पड़ताल करेगा—कंपनी, ठेकेदार, कार्य राशि, काम की जगह, भुगतान, माप करने वाले अधिकारी और गुणवत्ता प्रमाणित करने वाले अधिकारी तक।
क्योंकि सवाल केवल बिजली के खंभों का नहीं है।
सवाल जनता के करोड़ों रुपये का है।
और जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है—
“बिजली सुधार के नाम पर पैसा किसे मिला और बदले में इंदौर को मिला क्या?”

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