उम्र ढलती नहीं, आदमी बदलता है—संध्याकाल ही आत्मबोध की असली सुबह है

 संपादकीय

प्रणव बजाज


साठ वर्ष पार करना आज के समाज में अक्सर ऐसे देखा जाता है, जैसे जीवन की गाड़ी अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई हो। चेहरे पर झुर्रियां दिखीं नहीं कि लोग सलाह देने लगते हैं—अब आराम कीजिए, अब पीछे हट जाइए, अब आपकी उम्र नहीं रही। लेकिन सच यह है कि उम्र शरीर की घटती ताकत का नाम हो सकती है, जीवन की घटती सार्थकता का नहीं।



बल्कि कई बार जिंदगी का सबसे सच्चा अध्याय वहीं शुरू होता है, जहां समाज हमें बूढ़ा घोषित कर देता है।


जवानी में आदमी अपना जीवन कम और दूसरों की अपेक्षाएं ज्यादा जीता है। पैसा चाहिए, प्रतिष्ठा चाहिए, पहचान चाहिए, सत्ता के करीब रहना है, समाज में नाम बनाना है—इन इच्छाओं की दौड़ में आदमी यह पूछना ही भूल जाता है कि आखिर वह स्वयं चाहता क्या है?


यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है।


हमने सफलता का पैमाना इतना खोखला बना दिया है कि आदमी की कीमत उसकी उम्र से नहीं, उसकी कमाई, पद और प्रभाव से तय होने लगी है। जिसने जीवनभर ईमानदारी से संघर्ष किया, उसे वृद्ध कहकर किनारे कर दिया जाता है; और जिसने व्यवस्था को खोखला करके संपत्ति खड़ी कर ली, उसे सफल कहा जाता है।


यह कैसी सभ्यता है?


साठ के बाद आदमी खत्म नहीं होता, मुखौटे उतरने लगते हैं


जीवन का संध्याकाल दरअसल वह समय है जब आदमी को दूसरों को खुश करने की मजबूरी कम होने लगती है। वह पहली बार अपने भीतर झांक सकता है।


अब तालियां जरूरी नहीं।

अब हर व्यक्ति की स्वीकृति जरूरी नहीं।

अब हर बहस जीतना जरूरी नहीं।

अब हर रिश्ते को ढोना जरूरी नहीं।


और शायद यही उम्र की सबसे बड़ी उपलब्धि है—आदमी धीरे-धीरे दुनिया से नहीं, अपने झूठे अहंकार से दूर होने लगता है।


जवानी में हम भविष्य के पीछे भागते हैं और बुढ़ापे में अतीत को ढोते हैं। लेकिन समझदार व्यक्ति वह है जो दोनों से मुक्त होकर वर्तमान को जीना सीख ले।


प्रकृति से बड़ा कोई विश्वविद्यालय नहीं


झील के किनारे बैठना, पेड़ों की छाया में चलना, बारिश की आवाज सुनना या किसी शांत शाम को अकेले रहना—ये छोटी चीजें लग सकती हैं, लेकिन यही वे क्षण हैं जिनमें आदमी अपने भीतर लौटता है।


प्रकृति किसी से उसका पद नहीं पूछती।

वह यह नहीं पूछती कि आपके पास कितना पैसा है।

वह आपकी राजनीतिक पहुंच नहीं देखती।


वह सिर्फ आपको स्वीकार करती है।


और शायद इसलिए जीवन के अंतिम पड़ाव में प्रकृति मनुष्य की सबसे बड़ी साथी बन जाती है।


लेकिन आत्मिक परिपक्वता अपने आप नहीं आती


यह भ्रम भी छोड़ना होगा कि उम्र बढ़ते ही आदमी समझदार हो जाता है।


उम्र केवल कैलेंडर बदलती है, चेतना नहीं।


साठ वर्ष का व्यक्ति भी ईर्ष्या, लालच, अहंकार और बदले की भावना में उतना ही फंसा हो सकता है जितना तीस वर्ष का व्यक्ति। फर्क सिर्फ इतना है कि उसे अब अपने भीतर झांकने का अवसर ज्यादा मिला है।


यदि इतने वर्षों के बाद भी आदमी दूसरों की सफलता से जलता है, सत्ता के सामने झुकता है, कमजोर पर हावी होता है और अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करता, तो उसकी उम्र भले साठ हो—उसकी चेतना अभी भी अपरिपक्व है।


संध्याकाल को अंत समझना सबसे बड़ी भूल है


सूर्यास्त को देखकर कोई यह नहीं कहता कि सूर्य हार गया।


हम जानते हैं कि वह अपनी यात्रा पूरी कर रहा है।


मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है। युवावस्था की उग्रता, मध्यावस्था की जिम्मेदारियां और वृद्धावस्था की शांति—ये जीवन के विरोधी चरण नहीं, बल्कि एक ही यात्रा के अलग-अलग पड़ाव हैं।


इसलिए साठ के बाद जिंदगी को रोकने की जरूरत नहीं, उसे पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है।


अब दौड़ दूसरों से नहीं, स्वयं से होनी चाहिए।


अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मैंने कितना कमाया, कितने लोगों ने मुझे जाना और कितनी ऊंचाई हासिल की।


सवाल होना चाहिए—


मैंने कितना सच जिया?

कितना प्रेम किया?

कितना क्षमा किया?

कितना मुक्त हुआ?

और अंततः अपने भीतर के मनुष्य को कितना पहचाना?


क्योंकि जीवन का अंतिम हिसाब बैंक खाते में नहीं होता।


असली हिसाब आत्मा के भीतर होता है।


और शायद जीवन का सबसे सुंदर सत्य यही है—संध्याकाल जीवन का अंत नहीं, उस जीवन से मुक्ति है जिसे हमने दूसरों के लिए जिया; और उस जीवन की शुरुआत है जिसे पहली बार हम अपने लिए जीते हैं।

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