नई दिल्ली। नीट-यूजी 2026 पेपर लीक मामले में सीबीआई की जांच को दिल्ली की विशेष फास्ट ट्रैक अदालत से अहम मंजूरी मिली है। अदालत ने 13 आरोपियों के खिलाफ दाखिल सीबीआई की चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध सामग्री से संकेत मिलता है कि सभी आरोपी नीट प्रश्नपत्र लीक करने वाले सक्रिय सिंडिकेट का हिस्सा थे।
सीबीआई के मुताबिक आरोपियों ने मिलकर भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान के प्रश्नपत्रों को परीक्षा से पहले हासिल कर अभ्यर्थियों तक पहुंचाने की साजिश रची। इसके बदले कथित तौर पर आर्थिक लाभ लिया गया। आरोपियों में तीन विषय विशेषज्ञ भी शामिल हैं, जिन्हें सरकारी कर्मचारी की श्रेणी में रखा गया है।
मामले में सीबीआई ने करीब 20 हजार पन्नों की चार्जशीट और दस्तावेज अदालत के समक्ष रखे हैं। जांच में 360 गवाहों का भी उल्लेख किया गया है।
जांच में सामने आया बड़ा नेटवर्क
सीबीआई की जांच के अनुसार प्रश्नपत्र लीक की कड़ी परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े लोगों, बिचौलियों, कोचिंग नेटवर्क और लाभार्थी अभ्यर्थियों तक जाती है। इससे मामला किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रश्नपत्र हासिल करने तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करता है।
सीबीआई ने इससे पहले रसायन विज्ञान के प्रश्नपत्र के कथित स्रोत पी.वी. कुलकर्णी को गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसी के अनुसार उन्होंने विद्यार्थियों को विशेष कक्षाओं में प्रश्न, विकल्प और सही उत्तर बताए थे, जिनका बाद में वास्तविक परीक्षा के प्रश्नपत्र से मिलान हुआ।
अदालत की टिप्पणी क्यों अहम?
अदालत का यह निष्कर्ष फिलहाल प्रथम दृष्टया आकलन है, अंतिम दोषसिद्धि नहीं। लेकिन इससे जांच एजेंसी के उस दावे को न्यायिक स्तर पर गंभीरता मिली है कि नीट प्रश्नपत्र लीक के पीछे संगठित सिंडिकेट काम कर रहा था।
अब अगला महत्वपूर्ण चरण आरोप तय करने की प्रक्रिया होगी। मामला यह सवाल भी उठाता है कि देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं में प्रश्नपत्र की गोपनीयता और निगरानी व्यवस्था में आखिर इतनी बड़ी सेंध कैसे लगी।

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