एपिसोड-4 :
काली सूची से करोड़ों के ठेके तक पहुंचा खेल? केतन कंस्ट्रक्शन, वीरेंद्र रघुवंशी और बंसल कंस्ट्रक्शन के मामलों ने खोली निविदा व्यवस्था की परतें ?
प्रणव बजाज
मध्यप्रदेश की सड़कों पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ रुपये की कहानी केवल डामर, गिट्टी और सीमेंट की नहीं है। इसके पीछे निविदा, पात्रता, ठेका, गुणवत्ता जांच, भुगतान और अधिकारियों की स्वीकृति की पूरी व्यवस्था काम करती है।
सीएजी की सड़क संबंधी निष्पादन लेखापरीक्षा ने इसी व्यवस्था की कई परतें खोल दी हैं। 25 लोक निर्माण विभाग संभागों के अभिलेख, 276 सड़क कार्यों और 10 न्यू डेवलपमेंट बैंक परियोजनाओं की जांच के साथ 51 सड़कों का मौके पर निरीक्षण किया गया। रिपोर्ट में औसतन 424 दिन की देरी, निविदा प्रक्रिया में खामियां, काली सूची वाले ठेकेदारों को काम और घटिया निर्माण के बावजूद भुगतान जैसी गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।
पहला नाम : केतन कंस्ट्रक्शन लिमिटेड
सीएजी ने विदिशा में केतन कंस्ट्रक्शन लिमिटेड का मामला दर्ज किया है। कंपनी को अगस्त 2018 में किसी अन्य परियोजना में धीमी प्रगति और चार वर्ष की देरी के कारण काली सूची में डाला गया था। इसके बाद भी सितंबर 2018 में कंपनी ने सोरठिया वेलजी रत्ना एंड कंपनी के साथ संयुक्त उपक्रम बनाकर करीब 139.25 करोड़ रुपये का ठेका हासिल कर लिया।
सीएजी ने इसे काली सूची वाले ठेकेदार को अनियमित तरीके से काम दिए जाने का मामला माना। सरकार ने लेखापरीक्षा के दौरान स्वीकार किया कि काली सूची की स्थिति अद्यतन करने और पहचान संख्या रोकने में देरी के कारण ऐसा हुआ हो सकता है।
यानी सवाल केवल ठेकेदार पर नहीं है।
जब ठेकेदार काली सूची में था, तो निविदा जांच किस स्तर पर हुई?
दूसरा नाम : वीरेंद्र रघुवंशी
सीएजी ने वीरेंद्र रघुवंशी के मामले को भी दर्ज किया है। मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम ने जनवरी 2019 में उन्हें काली सूची में डाला था और यह अवधि जनवरी 2021 तक थी।
इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग ने बर्रीघाट-धतूरिया-करैया-अंडिया से इक्लोदिया सड़क का काम उन्हें करीब 6.04 करोड़ रुपये में दे दिया।
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ।
ठेकेदार ने 11 जनवरी 2021 को निविदा जमा की थी, जिसकी वैधता 10 अप्रैल 2021 तक थी। वित्तीय निविदा मार्च 2021 में खोली गई, लेकिन स्वीकृति पत्र 12 अगस्त 2021 को जारी हुआ—यानी निविदा की वैधता खत्म होने के काफी बाद।
सीएजी ने इसे अमान्य निविदा पर स्वीकृति पत्र जारी करने का मामला माना। सितंबर 2025 तक सरकार की ओर से इस पर कोई जवाब नहीं दिया गया था।
तीसरा नाम : बंसल कंस्ट्रक्शन वर्क्स
भोपाल की डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी नगर मार्ग यानी कोलार रोड परियोजना में सीएजी ने बंसल कंस्ट्रक्शन वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड, भोपाल की बोली और उसके बाद की लागत को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
सितंबर 2022 में कंपनी को 182.36 करोड़ रुपये की अनुबंध राशि पर काम दिया गया। यह संभावित अनुबंध राशि से 18.04 प्रतिशत कम थी।
काम शुरू होने के बाद अगस्त 2023 में कंपनी ने करीब 23.84 करोड़ रुपये के अतिरिक्त जीएसटी की मांग की। सीएजी के अनुसार निविदा दस्तावेज में जीएसटी पहले से शामिल था।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सीएजी ने बताया कि अनुबंध मूल्य बाद में बढ़कर 302.60 करोड़ रुपये हो गया—यानी शुरुआती अनुबंध मूल्य से लगभग 66 प्रतिशत अधिक। रिपोर्ट ने बढ़े हुए कार्यक्षेत्र की समीक्षा और अतिरिक्त दावों को लेकर सवाल उठाए हैं।
सरकार की ओर से यह कहा गया कि जीएसटी का भुगतान नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि मात्रा सूची में जीएसटी शामिल था। लेकिन सीएजी ने जवाब को विरोधाभासी बताया, क्योंकि समिति द्वारा ठेकेदार को जीएसटी भुगतान की अनुमति देने की बात भी सामने आई।
चौथा मामला : पी.डी. अग्रवाल
रतलाम संभाग में पी.डी. अग्रवाल की बोली संभावित राशि से 26.71 प्रतिशत कम थी। जुलाई 2018 में बोली स्वीकार हुई, लेकिन ठेकेदार ने अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं किए।
विभाग ने 43.65 लाख रुपये की धरोहर राशि जब्त कर ठेका निरस्त किया, लेकिन सीएजी के अनुसार ठेकेदार को न तो निलंबित किया गया और न काली सूची में डाला गया।
सवाल फिर वही है—जब विभाग के नियमों के मुताबिक कार्रवाई की गुंजाइश थी, तो सिर्फ धरोहर राशि जब्त करके मामला क्यों छोड़ दिया गया?
पांचवां मामला : राम प्रकाश गुप्ता
मंदसौर संभाग में रतलाम-नसीराबाद सड़क के शहरी हिस्से का काम राम प्रकाश गुप्ता को संभावित अनुबंध राशि से 24.99 प्रतिशत कम दर पर दिया गया।
लेकिन ठेकेदार ने आवश्यक कार्य निष्पादन सुरक्षा राशि जमा नहीं की। विभाग ने 9.03 लाख रुपये की धरोहर राशि जब्त की, मगर सीएजी के मुताबिक ठेकेदार को निलंबित या काली सूची में नहीं डाला गया।
बाद में तीसरी निविदा में सबसे कम बोली लगाने वाले ठेकेदार को काम दिया गया और विभाग ने बताया कि इससे नुकसान टल गया। लेकिन सीएजी का सवाल कार्रवाई न करने को लेकर बना रहा।
अब सवाल ठेकेदार से आगे जाता है
इन मामलों में एक पैटर्न दिखाई देता है—कहीं काली सूची के बावजूद काम, कहीं निविदा की वैधता खत्म होने के बाद स्वीकृति, कहीं अनुबंध सुरक्षा नहीं देने पर भी सीमित कार्रवाई और कहीं बोली के बाद लागत में बड़ा बदलाव।
सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया कि पांच करोड़ रुपये से अधिक मूल्य वाले 61 में से 59 निविदाओं के निविदा आमंत्रण केवल एक समाचार पत्र में प्रकाशित किए गए। रिपोर्ट के मुताबिक इससे व्यापक प्रचार और प्रतिस्पर्धा के उद्देश्य पर असर पड़ा। इसके अलावा 2019 से 2023 के बीच अंतिम रूप दी गई निविदाओं में निविदा मूल्यांकन समितियों की संरचना में भी अनियमित बदलाव पाए गए।
यानी सवाल यह नहीं कि ठेका किसने लिया।
सवाल यह है कि ठेका देने से पहले विभाग ने क्या जांचा?
काली सूची की जानकारी किसने सत्यापित की?
निविदा की वैधता किसने देखी?
सुरक्षा राशि जमा हुई या नहीं, इसकी निगरानी किसने की?
अतिरिक्त लागत का परीक्षण किसने किया?
और सबसे बड़ा सवाल—
घटिया निर्माण मिलने के बाद भुगतान रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी?
सीएजी ने 11 सड़क कार्यों में पीक्यूसी और डीएलसी की संपीड़न क्षमता निर्धारित मानकों से कम पाई। इसके बावजूद काम स्वीकार किया गया और भुगतान में कटौती नहीं की गई। लेखापरीक्षा ने इससे करीब 6.43 करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान का उल्लेख किया है।
88,634 करोड़ की नई योजना से पहले पुराने हिसाब का सवाल
मध्यप्रदेश सड़क व्यवस्था के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न केवल नई सड़कें बनाने का नहीं, बल्कि पुरानी व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का है।
अगर काली सूची वाला ठेकेदार फिर ठेका हासिल कर सकता है, निविदा की वैधता खत्म होने के बाद भी स्वीकृति पत्र जारी हो सकता है और मानक से कम गुणवत्ता वाला काम भुगतान हासिल कर सकता है, तो केवल नए बजट से सड़कें बनाने से व्यवस्था कैसे सुधरेगी?
सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए—
कितने ठेकेदार वर्तमान में काली सूची में हैं?
कितने काली सूची वाले ठेकेदारों को पिछले वर्षों में किसी सरकारी विभाग ने काम दिया?
सीएजी की आपत्तियों पर कितने अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई?
6.43 करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान की वसूली कितनी हुई?
और—
क्या सड़क की गुणवत्ता प्रमाणित करने वाले अधिकारी भी उसी तरह जवाबदेह होंगे, जिस तरह ठेकेदार को जवाबदेह माना जाता है?
क्योंकि सड़क जनता के पैसे से बनती है।
ठेका सरकार देती है।
गुणवत्ता विभाग जांचता है।
भुगतान सरकार करती है।
फिर सड़क टूटने पर जिम्मेदारी सिर्फ ठेकेदार की कैसे हो सकती है?
बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल जारी रहेगी...
एपिसोड-5 में : सड़क की गुणवत्ता जांचने वाले कौन? प्रयोगशाला, गुणवत्ता प्रमाणपत्र और भुगतान की पूरी कड़ी—किसके हस्ताक्षर से सरकारी पैसा निकला?

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